नामे हुसैन गूंजा है शंकर के शहर में, गूंजी है कर्बला में सदा मैं हुसैन हूं... की सदाओं से काशी की गलियां और चौराहे गूंजते रहे। यौमे आशूरा पर जब ताजियों का जुलूस निकला तो हर आंख अश्कबार थी और हर होंठ पर या हुसैन अलविदा... के बोल थे। अजादारों ने जंजीर और कमा के मातम के जरिये करबला के 72 शहीदों को खून के साथ ही आंसूओं का नजराना पेश किया। देर रात सबसे आखिर में रांगे का ताजिया दरगाह ए फातमान पहुंचा।