बाबा महाश्मशाननाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने कहा कि एक समय में लोग मणिकर्णिका घाट की ओर देखना पसंद नहीं करते थे। मैं उसी गली में पैदा हुआ हूं। हमारे यहां पूजा का सामान भी उसी गली से आता है। शवयात्रियों से सामान छू जाता था। हमने उसे छूत नहीं माना, क्योंकि वह मार्ग मंगलकारी है। मिट्टी उठाकर हमने भस्म कह दिया तो वही माना जाता है। पहले बहुत छोटे स्तर पर होता था, जब प्रचार प्रसार हुआ तो भीड़ बढ़ने लगी तो लोगों को लगा यह त्योहार भी है। आज श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन को लोग आने वाले लोग मणिकर्णिका जरूर जाते हैं। मंदिर कमेटी से जुड़े 15 लोग और 50 से अधिक लोग भस्म अर्पित करते हैं और प्रसाद बांटते हैं। हम अपनी सीमा और परिधि से बाहर नहीं जाते हैं।