नागिरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ला ने कहा कि मसाने की होली हमारे शास्त्रों में नहीं है, वह हमारा अतीत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जो होता है उसमें लोक वाली चलती है या शास्त्र वाली। पूरा पूरब शब्दों का गलत उच्चारण करता है, तो क्या हम पूरे समाज को डंडा लेकर मारने दौड़ेंगे। नहीं...। दौड़ना भी नहीं चाहिए। बीच का रास्ता, शास्त्र सम्मत रास्ता निकालना चाहिए। दो दशक में ही मसाने की होली खड़ी हो गई और अब उत्सव बन गई। अब सवाल यह है कि हम किस अधिकार से रोक रहे हैं और किस अधिकार से चला रहे हैं। मसाने की होली से जो शिकायतें हैं उन्हें दूर करना होगा। शास्त्रसम्मत हल तलाशना होगा। त्योहार को बनारसी बनाइए और गैर बनारसी तत्व को छोड़ना होगा। उस त्योहार को देश निकाला मत कहिए, उसे अपना बनाइए।