डिजिटल के लिए प्रस्तावित- महंगी पड़ रही धान की खेती, लागत के बोझ तले हर साल सिमट रहा किसानों का रकबा सुल्तानपुर: खाद-बीज, डीजल, सिंचाई, मजदूरी और बिजली की बढ़ती लागत ने धान की खेती को किसानों के लिए घाटे का सौदा बना दिया है। मौसम की अनिश्चितता और स्थानीय धान मंडी के अभाव से किसानों का भरोसा भी टूट रहा है। नतीजतन क्षेत्र में हर साल धान का रकबा लगातार घट रहा है। देवरा के किसान सुधीर कुमार श्रीवास्तव ने 2023 में 35 बीघे में धान लगाया था, लेकिन इस वर्ष रकबा घटाकर 12 बीघे कर दिया है। रबीन्द्रनाथ पांडेय ने भी 15 से घटाकर 11 बीघे में खेती करने का फैसला लिया है। वहीं पूरे चंदिका मिश्र के किसान अम्बिका प्रसाद मिश्रा ने 35 से 12 बीघे तक रकबा सीमित कर दिया। किसानों का कहना है कि नहरों में समय से पानी नहीं मिलने से डीजल से सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि मजदूरी भी 150 रुपये से बढ़कर 200 रुपये प्रतिदिन पहुंच गई है। किसानों ने क्षेत्र में स्थायी धान खरीद केंद्र और स्थानीय मंडी स्थापित करने की मांग की है। उनका कहना है कि उचित मूल्य मिलने पर ही धान की खेती फिर से लाभ का सौदा बन सकती है।