दीपावली पर दूसरे के घर को रोशन करने वाले कुम्हारों की भविष्य अंधेरे में गुजार रही है। वहीं, अब नई पिढियां पुस्तैनी कार्य से दूरी बना रहे हैं। घर का खर्च चलाने के लिए युवा शहरों में जाकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि सरकार भले ही कुम्हारों के रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। हमें कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।