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VIDEO : परंपरा को सहेज रहीं प्रीति, बच्चों के चेहरों पर ला रहीं मुस्कान, सीमित संसाधन व अपनी मेहनत के बल पर बनाई पहचान

आधुनिकता की चकाचौंध के बीच आज भी प्रीती प्राचीन परंपराओं को संजोए हुए हैं। वह आज भी सीमित संसाधन जहां बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला रही हैं। वहीं सीमित बाजार में मेहनत के बल पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनके इस काम में पहले सास तो अब बेटी सहयोग कर रही है। उनके मिट्टी के खिलौने प्रत्येक मेले व हाट बाजार में बिक रहे। इसी से उनके परिवार का भरण पोषण हो रहा हैं। नेपाल राष्ट्र के नेपालगंज से 15 वर्ष पूर्व भिनगा नगर के मोहल्ला मंगल भट्ठा निवासी अरुण से विवाह कर आई प्रीती ने मुफलिसी का जीवन जिया। अरुण मजदूरी पेशा था जिसकी कमाई से घर खर्च नहीं चल पाता था। इस बीच उसने कुछ करने की ठाना। बचपन में मिट्टी के खिलौने बनाकर उससे खेलने वाली प्रीती ने इसे ही अपना रोजगार बना लिया। उसके इस काम में सहयोग दिया उसकी सास श्यामावती ने। जो मिट्टी लाने व गूथने में उसकी मदद करती थी। उसी मिट्टी से अपने हाथों के हुनर के बल पर प्रीति ने अपनी कल्पनाओं को मूर्त रूप देना शुरू किया। उसने पहले अपने खिलौने स्थानीय बाजार में बेचा, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। इसके बाद प्रीति के हौसले को पंख लग गए बाद में उसने प्रकाश पर्व दीपावली के लिए मिट्टी का रंगीन दिया, गणेश लक्ष्मी, पशु पक्षी, फल, मोटू पतलू, लाफिंग हलवाई दंपत्ति, देवी देवताओं की मूर्तियां, खिलौने में घर, खरगोश, गाय, फूलदान सहित कई अन्य प्रकार के खिलौने बनाने लगीं। जिसे स्थानीय बाजारों सहित दीपावली व कार्तिक पूर्णिमा मेला सहित साप्ताहिक बाजार में जाकर पति के साथ बेचने लगी। जिससे परिवार का गुजारा होने लगा। अब जब दीपावली व कार्तिक पूर्णिमा मेला करीब है तो उसके काम में बेटी अंशिका भी सहयोग कर रही है। जो स्कूल से आने के बाद मां के काम में हाथ बंटाती है। प्रीती आज अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी है। मिले आर्थिक सहयोग और निखरे कला प्रीति बताती हैं कि वह रायनी स्वयं सहायता समूह से जुड़कर काम कर रही हैं। लेकिन उत्पाद बनाने के लिए जिस मिट्टी की जरूरत होती है वह नहीं मिल पाती। बड़ी मुश्किल से भट्ठा व जंगल से किसी प्रकार मिट्टी लाती हैं। उत्पाद बेचने के लिए कोई निर्धारित स्थान न होने से मेलों में जाकर सामान बेचना पड़ता है। यदि सरकार से आर्थिक सहयोग मिले तो कला और निखरेगी।

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