लालगंज (रायबरेली)। कस्बे के रामलीला मैदान में दशहरे की शाम रावण का पुतला दहन केवल आतिशबाजी का नजारा नहीं होता, बल्कि एक परंपरा की याद भी ताजा करता है। घोषियाना मोहल्ला निवासी इस्माइल चाचा ने करीब 54 साल पहले रामलीला कमेटी के आग्रह पर पहला रावण का पुतला बनाया था। तब से हर साल मैदान में खड़ा होने वाला रावण उनकी मेहनत और कारीगरी से ही तैयार होता रहा। तीन साल पहले इस्माइल चाचा का निधन हो गया, लेकिन उनकी परंपरा आज भी कायम है। अब उनका बेटा सलीम यह जिम्मेदारी निभा रहा है। परास्नातक तक पढ़े सलीम बताते हैं कि पुतला बनाने में करीब एक महीने की मेहनत और लगभग 15 हजार रुपये का खर्च आता है। आतिशबाजी समेत कुल खर्च 20 हजार तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद वह इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। सलीम की बहन आसमा बानो भी पहले पिता की मदद किया करती थीं। उनका कहना है कि यह काम धर्म के लिए नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने के लिए शुरू किया गया था। रामलीला कमेटी अध्यक्ष रवि मुरारका समय पर सहयोग देते हैं, जिससे यह परंपरा आगे बढ़ रही है।