जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी की दूरी स्थित नगर पंचायत पाली क्षेत्र में विंध्याचल की वादियों में भगवान शिव की त्रिमुखी प्रतिमा है। करीब 9-10वीं शताब्दी का यह मंदिर अपने में कई रहस्यों को समाए हुए है, जिससे वशीभूत होकर यहां शिवभक्तों का हमेशा आना बना रहता है। मंदिर में 108 सीढि़यों को चढ़कर जाना होता है लेकिन रास्त में बीच पहाड़ियों से आ रहे प्राकृतिक जल पीने से सारी थकान दूर हो जाती है। महाशिवरात्रि पर्व पर यहां भक्तों का सैलाब देखते ही बनता है। मंदिर में भगवान नीलकंठेश्वर की त्रिदेव मूर्ति के संबंध में यहां के पुजारी आजाद पुरी गोस्वामी बताते हैं कि करीब 9-10वी शताब्दी की भगवान शिव की त्रिदेव मूर्ति की पहली मुद्रा विष पीते हुए हैं,मस्तक पर गंगा जी और पास में भैरव बाबा स्थापित है। मुगलकाल में इस मुद्रा को खंडित करने का प्रयास किया गया था लेकिन गाल कटते ही उससे दूध की धार निकलने लगी थी जिस वजह से मुगलों की हिम्मत नहीं पड़ी। मध्य में ध्यान मुद्रा रुद्राक्ष की माला के साथ है और तीसरी हास्य मुद्रा में अर्द्धनारेश्वर स्वरूप त्रिशूल के साथ हैं। मंदिर के मध्य में एक मुख शिवलिंग की स्थापना है,जबकि नंदी मंदिर के बाहर बैठे हैं। भूतभावन भगवान नीलकंठेश्वर की नगरी में महाशिवरात्रि पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि पर्व पर भक्तों का सैलाब देखते ही बनता है। सुबह से ही शिवभक्त यहां महाशिवरात्रि पर्व का स्नान करने सीतामढ़ी आश्रम झरना,नीलकंठ झरना पर पहुंच आस्था की डुबकी के साथ धर्म लाभ लेते हैं। श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर पूरी आस्था के साथ पूजा अर्चना करते हैं। महाशिवरात्रि पर्व को लेकर यहां मेले जैसा माहौल बना रहता है। दिन भर यहां श्रदालुओं के लिए भंडारे की व्यवस्था चलती है। रात्रि में यहां वैदिक रीति रिवाजों से भगवान शिव का विवाह संपन्न होता है।