9 सितंबर 1960, यह वह दिन है, जिस दिन महान शायर जिगर मुरादाबादी दुनिया को अलविदा कह गए। दरअसल, शख्स मर जाता है, शख्सियत जिंदा रहती है। दुनिया के तमाम बड़े लोगों की तरह जिगर साहब का भी यही मामला है, उनका नाम भी जिंदा है उनका कलाम भी जिंदा है। इमामबाड़ा मोहल्ला निवासी फैज बारी का कहना है कि जिगर साहब का नाम बचपन से सुना था। जिगर साहब की अहमियत का अंदाजा मुल्क से बाहर जाने के बाद हुआ। कतर में वह जब नौकरी के सिलसिले में गए, वहां पर कुछ उर्दू देशों के लोगों से मुलाकात हुई। उस वक्त पता चला कि जिगर वहां पर पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाते हैं। यह सुनकर फख्र हुआ। जिगर मुरादाबादी की याद में गोंडा में जिगरगंज मोहल्ला है, जहां पर नगर पालिका ने उनकी आरामगाह बनवाई है। जिगर मेमोरियल इंटर कॉलेज चल रहा है। जिगर मार्केट है। अब उनकी स्मृति में लाइब्रेरी बनाने की मांग उठ रही है। 9 सितंबर को जिगर मुरादाबादी की पुण्यतिथि पर कई कार्यक्रम होंगे। कॉलेज में स्कूली बच्चों को जिगर साहब के व्यक्तित्व के बारे में बताया जाएगा। शाम को जिगर मेमोरियल इंटर कॉलेज में मुशायरे का आयोजन किया गया है। मुहब्बत का पैगाम देती है जिगर की शायरी मशहूर शायर नजमी कमाल का कहना है कि जिगर मुरादाबादी पैदा जरूर मुरादाबाद में हुए लेकिन चश्मे के कारोबार सिलसिले में गोंडा आए तो यहीं के होकर रह गए। जिगर की रचनाओं ने लोगों को गजल लिखना सिखाया। उनकी रचनाएं आज भी लोगों की जुबां पर है। तरन्नुम में शायरी पढ़ने की शुरूआत जिगर ने ही की थी। उनकी गजलों में सौंदर्यबोध के साथ ही सियासत का जिक्र भी रहता था। जो नेताओं के लिए किसी सबक से कम नहीं है। उन्होंने हिंदी व उर्दू दोनों में लोगों को गजल के नए अंदाज से वाकिफ कराया। इरफान मोईन कहते हैं कि दुनिया को बड़ी बारीकी से देखने वाले जिगर मुरादाबादी ने लिखा है-आदमी आदमी से मिलता है, दिल मगर कम किसी से मिलता है। इनकी रचनाओं में मुहब्बत का पैगाम है। उनके पढ़ने का तरीका बहुत ही दिलकश और मोहक था। सुमन पांडेय ने कहा कि दिल को सुकून रुह को आराम आ गया, मौत आ गई कि दोस्त का पैगाम आ गया। की लाइनें आज भी लोगों के बीच में जिगर मुरादाबादी को एक नई ऊंचाई देती है। सभासद फहीम सिद्दीकी कहते हैं कि जिगर मुरादाबादी हमारी शान है। जिगर ने जब कहा कि यह इश्क नहीं आसां, तो इसमें सिर्फ महबूबा से इश्क की बात नहीं कही गयी है बल्कि तमाम इंसानों से मुहब्बत के बारे में कहा गया है। हर एक को चाहे वो दोस्त हो या दुश्मन, गले लगाने की बात कही गयी है। उनका जो फर्ज है वो अहले सियासत जानें, मेरा पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे। एक नजर जिगर मुरादाबादी पर जिगर मुरादाबादी का पूरा नाम अली सिकंदर जिगर मुरादाबादी है। इनका जन्म 6 अप्रैल 1890 को मुरादाबाद में हुआ। बाद में वह गोंडा आ गए। यहां पर उन्होंने लिखना शुरू किया। दागे जिगर, शोल-ए-तूर, आतिश-ए-गुल उनकी रचनाओं में शामिल है। 9 सितंबर 1960 को उनका निधन हो गया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उन्हें आनरेरी डाक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है।