देश के आम बजट में हर जिले के ट्रामा सेंटर को संसाधनयुक्त बनाने और एंबुलेंस की संख्या बढ़ाने की घोषणा भले ही राहत देने वाली हो, लेकिन बाराबंकी की हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यहां का ट्रामा सेंटर आज भी सिर्फ कागज़ों में ही मौजूद नजर आता है। जिले में हालात इतने गंभीर हैं कि हर 16 घंटे में एक व्यक्ति की सड़क हादसे में मौत हो रही है। करीब 5000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले जिले में कहीं भी दुर्घटना होने पर मरीज को जिला अस्पताल लाया जाता है, लेकिन वहां माइक्रो जांच, माइक्रो सर्जरी और तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञ सर्जन जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। मजबूरी में गंभीर मरीजों को केजीएमयू लखनऊ रेफर किया जाता है। जाम और अव्यवस्थित यातायात के कारण बाराबंकी से लखनऊ पहुंचने में कई बार डेढ़ घंटे तक का समय लग जाता है, और यही देरी कई मरीजों की जान ले लेती है। स्थिति यह है कि ट्रामा सेंटर पहुंचने वाले घायलों को कभी-कभी स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हो पाता। इलाज के नाम पर सिर्फ मलहम-पट्टी और कुछ दवाएं देकर रेफर कर दिया जाता है। अब जब बजट में ट्रामा सेंटर के विस्तार और आधुनिकीकरण का प्रावधान किया गया है, तो उम्मीद जगी है कि बाराबंकी का ट्रामा सेंटर भी जमीन पर उतर सकेगा। डॉ. अवधेश श्रीवास्तव का कहना है कि इससे पहले भी ट्रामा सेवाओं को 36 मिनट से 50 मिनट के रिस्पॉन्स टाइम में लाने की योजना प्रस्तावित की जा चुकी है, लेकिन वह अब तक फाइलों से बाहर नहीं आ सकी।