अयोध्या। पूराबाजार क्षेत्र के ऐमीआलापुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते हुए आचार्य ज्ञानचंद्र द्विवेदी ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह ग्रंथ ज्ञान, कर्म और भक्ति का पावन संगम है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास की परिपक्व बुद्धि और भावप्रवण मन की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है, इसलिए इसे पुराणों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्होंने कहा कि पुराणों में वेदों के गूढ़ तत्वों को सरल और लोकाभिमुख शैली में प्रस्तुत किया गया है। श्रीमद्भागवत का गहन अध्ययन करने से वेदों के मर्म को समझना संभव होता है। इसी कारण आचार्यों ने श्रीमद्भागवत को पंचम वेद की संज्ञा दी है और इसे भगवान का वाङ्मय विग्रह बताया है। कथा के दौरान आचार्य द्विवेदी ने परीक्षित जन्म प्रसंग और भीष्म पितामह की भावपूर्ण स्तुति का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भीष्म पितामह ने बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की थी कि जब तक उनके प्राण शरीर में रहें, तब तक वे अपने नेत्रों से भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन करते रहें। प्रवचन में उन्होंने यह भी बताया कि राजा परीक्षित ने कलियुग को रहने के लिए प्रारंभ में चार स्थान दिए थे। जुआ, मदिरालय, वेश्यालय और कसाईखाना। बाद में उन्होंने स्वर्ण में भी कलियुग का निवास बताया, जिसका अर्थ अन्यायपूर्वक अर्जित धन से है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा का श्रवण किसी फल की कामना से नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और आत्मिक शांति के लिए करना चाहिए। जो श्रद्धालु नियमपूर्वक कथा श्रवण करता है, उसे परम आनंद की प्राप्ति होती है। कथा में मुख्य यजमान चिंतामणि पाण्डेय, अनारकली, देवेंद्र पाण्डेय, कमलेश तिवारी, रामधीराज पाण्डेय, शिव प्रसाद पाण्डेय, प्रताप नारायण पाण्डेय, कौशल किशोर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।