आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से 25 जुलाई को चातुर्मास का शुभारंभ हो गया है । इसके साथ ही सनातन परंपरा के अनुसार अगले चार महीनों तक विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन सहित अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रहेंगे। इस अवधि में साधु-संत अपने भ्रमण को विराम देकर एक ही स्थान पर निवास करेंगे। जप, तप, स्वाध्याय और धर्मोपदेश में समय व्यतीत करेंगे। चातुर्मास का समापन 21 नवंबर को देवोत्थानी एकादशी के साथ होगा, जिसके बाद पुनः शुभ कार्य प्रारंभ होंगे। चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक साधना का विशेष काल माना जाता है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, इसलिए इस अवधि में मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। श्रद्धालु इस समय पूजा-पाठ, व्रत, दान, भजन, धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन और सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित प्रवीण शर्मा बताते हैं कि चातुर्मास में भगवान शिव और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व है। श्रावण मास के दौरान शिव अभिषेक, रुद्र जप और पूजन करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है, जबकि भगवान विष्णु की कृपा के लिए विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस का नियमित पाठ करना चाहिए। आचार्य प्रवीण के अनुसार चातुर्मास इंद्रिय संयम, सात्विक जीवन और धर्म साधना का पर्व है। इस दौरान क्रोध, असत्य, नशा और मांसाहार से दूर रहकर सेवा, दान और धार्मिक कार्यों में अधिक समय देना चाहिए। बृहस्पति के अस्त होने के कारण देवशयनी एकादशी से पहले ही शुभ मुहूर्तों पर विराम लग चुका है। अब देवोत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए पुनः शुभ मुहूर्त उपलब्ध होंगे।