जस्टिस गोविंद माथुर ने कहा कि लोकतांत्रिक देश में कानून लोकहित में बनाए जाने चाहिए। तीन नए कानूनों के बारे में कहा जा रहा है कि हम औपनिवेशिक कानूनों से मुक्त हो कर के जनहित की तरफ जा रहे हैं पर क्या सिर्फ नाम बदलने मात्र से इन विधानों का चरित्र बदल गया। क्या एक लोकतांत्रिक देश में आपराधिक मानहानि हमारी संवैधानिक प्रथा में फिट बैठती है। मुझे ये बिलकुल हिचक नहीं है ये कहने में कि पिछले 10 सालों में इमरजेंसी के समय से भी ज़्यादा लोगों को अंदर डाला गया है और ऐसे ही कानून नए कानूनों में भी आगे बढ़ाए गए है। ये कहा गया कि राजद्रोह हटा दिया गया है, लेकिन उसकी जगह देशद्रोह के नाम से उसी कानून को और सख्त बना के प्रस्तुत किया गया है।