झांसी। गांवों में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें पहचानने और आगे बढ़ने का अवसर देने की है। पिछले एक दशक में खेलों के प्रति परिवारों की सोच में बदलाव आया है। सरकार की ओर से खिलाड़ियों को बेहतर संसाधन और डाइट उपलब्ध कराने का असर भी दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में खेल मैदानों की कमी, उनके रखरखाव और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं होने से बड़ी संख्या में प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस से पहले मंगलवार को अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों और कोचों ने ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे लाने पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि स्कूलों से ही प्रतिभाओं की तलाश शुरू कर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए तो गांवों से बड़ी संख्या में खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच सकते हैं। स्कूलों से शुरू हो प्रतिभाओं की तलाश उप क्रीड़ाधिकारी एवं बॉक्सिंग कोच सुनील कुमार ने कहा कि ग्रामीण प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए स्कूल सबसे अहम माध्यम हो सकते हैं। कई स्कूलों में खेल गतिविधियां सिर्फ औपचारिकता तक सीमित हैं। नियमित प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की व्यवस्था हो तो बच्चों की प्रतिभा शुरुआती स्तर पर ही पहचानी जा सकती है। ब्लॉक स्तर पर भी खेल गतिविधियां बढ़ाने की जरूरत है। छह स्पोर्ट्स हॉस्टल से बढ़ी उम्मीद हॉकी कोच सुजीत कुमार ने बताया कि जनपद में पहले चार स्पोर्ट्स हॉस्टल थे, अब इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई है। यहां खिलाड़ियों को नियमित प्रशिक्षण और बेहतर डाइट मिलने से खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। ऐसी सुविधाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक किया जाए तो वहां की प्रतिभाओं को भी आगे आने का अवसर मिलेगा। बॉक्सिंग संघ के अध्यक्ष डॉ. रोहित पांडेय ने कहा कि पिछले एक दशक में बॉक्सिंग में काफी बदलाव आया है। बेहतर सुविधाओं और प्रशिक्षण से जनपद के कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल किए हैं। अब गांवों में छिपी प्रतिभाओं को तलाशकर उन्हें आगे बढ़ाने की जरूरत है।