विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने आज अपने एक दिवसीय हिमाचल प्रवास के दौरान शिमला में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां के अल्पसंख्यक समाज को अपने पूजा स्थानों और सस्थाओं को अपने नियंत्रण में चलाने की छूट है। सरकार गुरूद्वारे, मस्जिद, चर्च, बौद्ध विहार और जैन मंदिरों का संचालन नहीं करती है। किंतु दुर्भाग्य से हिमाचल सरकार ने हिंदू समाज के सबसे बड़े धर्मस्थलों (कुल 37 मंदिरों) को अपने अधिकार में रखा हुआ है। अब समय आ गया है कि इन सभी बड़े मंदिरों का संचालन भी हिंदू समाज को सौंपा जाए। हिमाचल प्रदेश हिन्दू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1984 के अंतर्गत अधिगृहित मन्दिर का कार्य एक कमिश्नर देखता है तथा सरकार इन मंदिरों के न्यासियों को अपनी सुविधानुसार नामांकित करती है। जिससे मंदिर सरकार के हस्तक्षेप को झेलते है और इनके धार्मिक नेतृत्व को अपने धर्मस्थलों के बारे में निर्णय लेना का कोई अधिकार नहीं है। अक्सर सरकार इन मंदिरों के न्यासियों पर दवाब डाल कर उनके चढ़ावे (दान) का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रशासकीय कार्यों के लिए खर्च करती आई है, जिस कारण से इस विषय पर प्रदेश के माननीय उच्च न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। प्रतिवर्ष लगभग 200 करोड़ से अधिक चढ़ावा (राशि) इन मंदिरों में दिया गया धन सनातन संस्कृति में अपना विश्वास रखने वाले श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर विकास, लंगर, सेवा तथा मंदिर के अन्य विकास कार्यों के लिए दिया जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में इन 37 मंदिरों की वार्षिक आय 200 59 करोड़ थी। मंदिरों की 346.26 करोड़ की राशि सावधि जमा खाता में थी। इनके कोष में पर्याप्त सोना और चांदी भी है।