आधुनिकता की चकाचौंध में परंपरागत कारोबार को झटका लग रहा है। हालांकि डेढ़ से दो दशक पहले तक लोहे की वस्तुओं का कारोबार काफी अधिक फल फूल रहा था लेकिन जैसे प्लास्टिक की वस्तुओं ने बाजार में दस्तक की वैसे-वैसे लोहे की वस्तुओं में खेती बाडी और रसोई आदि की चीजों का यह कारोबार पूरी तरह से पिट रहा है। परंपरागत कारोबार करने वाली नीमू देवी के अनुसार अब इसकी डिमांड दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। महिला चालीस वर्षों से लोहे से बनी वस्तुओं को बेचने का कारोबार कर रही है लेकिन जो मांग डेढ़ दशक पहले तक हुआ करती थी आज उसमें 60 फीसदी से भी अधिक गिरावट आ गई है। जबकि बीते पांच वर्षों की बात करें तो इस अंतराल में इन वस्तुओं की डिमांड में काफी अधिक गिरावट आ गई है। ऐसे में अब इस परंपरागत वस्तुओं पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। नीमू देवी ने बताया कि वह अब लोहे की वस्तुओं के साथ जुराबें बनाकर बेचने का भी काम कर रही है लेकिन इसके बावजूद भी दुकान का किराया देना भी मुश्किल हो रहा है। घर का खर्चा निकालना तो काफी अधिक चुनौती बना हुआ है। उन्होंने बताया कि वह काफी लंबे समय से कुल्लू के पशु मैदान के साथ लगी मार्कीट में दुकान लगा रही है लेकिन अब मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। दरअसल, खेती बाड़ी करने के लिए कुदाली, किलनी, फरवा, हल में लगने वाले लोहे के उपकरण के अलावा अन्य कई वस्तुएं ऐसी हैं जिनसे परंपरागत हस्तशिल्प बाजार भी फलता फूलता था। लेकिन अब पावर टिलर, ट्रैक्टर आने के कारण इन सभी वस्तुओं की मांग घट गई है। जबकि इन वस्तुओं से ग्रामीण हस्तशिल्पियों को रोजगार मिलता था। महिला कारोबारी की माने तो दो दशकों में कई परंपरागत वस्तुओं को बनाने बालों में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस काम को छोड़कर दूसरा काम अपनाया है।