आज हम माउंट आबू के अर्बुदा देवी मंदिर के बारे में बता रहे हैं। यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी खासियत और इस शक्तिपीठ को जो अलग बनाती है, वह यह है कि यहां मां कात्यायनी की गुप्त रूप में पूजा होती है। गुजरात के अंबाजी शक्तिपीठ से भी इसका संबंध है।
माउंट आबू में अर्बुदा देवी मंदिर रोडवेज बस स्टैंड से करीब तीन किलोमीटर दूर साढ़े पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। अर्बुदा देवी को आबू की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। अर्बुदा देवी के बारे में यह भी कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान माता के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तों को सारे दुखों से मुक्ति मिल जाती है। नवरात्रि में माता के मंदिर में भक्तों की भीड़ बनी रहती है। नवरात्रि के छठवें दिन मां अर्बुदा यानी कात्यायनी के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ जमा होने लगती है।
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गुफा के संकरे मार्ग से होता है मंदिर में प्रवेश
यह मंदिर यहां के लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक है। मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में प्रतिष्ठित है। अर्बुदा देवी मंदिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को गुफा के संकरे मार्ग में होकर बैठकर जाना पड़ता है। मंदिर की गुफा के प्रवेश द्वार के समीप एक शिव मंदिर भी बना है। अष्टमी की रात्रि में यहां महायज्ञ होता है, जो नवमी के सवेरे तक पूर्ण होता है। नवरात्रों में यहां निरंतर दिन-रात अखंड पाठ होता है।
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अर्बुदा देवी मंदिर का निर्माण ठोस चट्टानों से किया गया है। यह देश में रॉक-कट मंदिरों के सर्वश्रेष्ठ नमूनों में से एक है। सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर एक ऊंची और विशाल पहाड़ी पर बहुत भव्य व आकर्षक लगता है। मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियां बनी हैं। ऊपर पहुंचने पर सुंदर दृश्य और शान्ति मन मोह लेती है और थकान पल भर में दूर हो जाती है। पास ही नव दुर्गा, गणेशजी और नीलकंठ महादेव मंदिर भी है। स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता अर्बुदा देवी को भवतारिणी, दुखहारिणी, मोक्षदायिनी और सर्वफलदायिनी माना गया है।
यह है मंदिर को लेकर मान्यता
ऐसी मान्यता है कि शिव तांडव में यहां सती मां के अधर गिरे थे। स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता के चरण पादुका की महिमा खूब गाई गई है। इसमें पादुका के दर्शन मात्र से ही मोक्ष यानि सदगति मिलने की बात भी कही गई है। यह वही चरण पादुका है, जिससे मां ने बासकली का वध किया था। एक ऋषि ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी। जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था। तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी। इसी वजह से ये कात्यायनी कहलाई थी।
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51 शक्तिपीठों में माउंट का अधरदेवी मंदिर
यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठ में से 1 है। यहां पर मां के होंठ गिरे थे, इसलिए इसे अधरदेवी कहा गया हैं। यहां तक कि स्कंद पुराण में भी माता के इस गुफा में छठे स्वरूप कात्यानी के रूप में विराजने का जिक्र है। यह अन्य शक्ति पीठ से इसलिए अलग है क्योंकि यहां पर मां की गुप्त स्वरूप में पूजा होती है। करीब साढ़े पांच हजार साल पहले इसकी स्थापना की गई थी।
दूसरी सबसे खास बात यह भी है कि आबूरोड से सटे गुजरात सीमा में मौजूद अंबाजी से भी इसका नाता है। वहां मां के आठवें स्वरूप की पूजा होती है, अकार वह भी शक्तिपीठ है, और नाता यह है कि यह दोनों बहनें हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां पर मां पार्वती के होंठ गिरे थे। तभी से यह स्थान अधर देवी के नाम से पहचाना जाता है।