राजस्थानी लोक संगीत को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध लोक कलाकार गफरू दीन मेवाती को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की है। गफरू दीन मेवाती राजस्थान के उन चुनिंदा लोक कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से गांव-ढाणी से लेकर बड़े मंचों तक राजस्थानी संस्कृति को जीवंत बनाए रखा। वे विशेष रूप से भपंग वाद्ययंत्र के वादन और लोकगीतों के माध्यम से कथा-वाचन के लिए जाने जाते हैं। भपंग, जो आज विलुप्त होती लोक वाद्य परंपरा में शामिल है, उसे गफरू दीन मेवाती ने अपनी पहचान और साधना का माध्यम बनाया।
मेवाती की कला केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं
मेवाती लोक परंपराओं, ऐतिहासिक कथाओं और सामाजिक संदेशों को अपने गीतों में पिरोने की उनकी शैली अनोखी है। वे महादेव जी का ब्यावला, श्रीकृष्ण से जुड़े छंद-पद्य तथा राजाओं की वंशावलियों को लोकगीतों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। खास बात यह है कि उनकी गायकी में हिंदू और मुस्लिम लोक कथाएं समान रूप से दिखाई देती हैं, जो समाज को आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का सशक्त संदेश देती हैं। यही कारण है कि उनकी कला केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का माध्यम भी बन गई है।
अलवर सहित पूरे मेवात क्षेत्र में खुशी की लहर
रविवार को जैसे ही केंद्र सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा हुई, अलवर सहित पूरे मेवात क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। गफरू दीन मेवाती के परिवार, शुभचिंतकों और साथी कलाकारों ने इस उपलब्धि को पूरे क्षेत्र का सम्मान बताया। उनके निवास पर बधाइयों का तांता लगा हुआ है, वहीं लोक कलाकारों के बीच भी उत्साह और गर्व का माहौल देखने को मिला।
पीएम मोदी का जताया अभार
इस अवसर पर गफरू दीन मेवाती ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों का है, जो वर्षों से अपनी परंपरागत कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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संघर्ष के दिनों को किया याद
गफरू दीन मेवाती का जीवन संघर्ष और साधना की मिसाल है। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब वे परिवार के पालन-पोषण के लिए मांग कर गुजारा करते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। लोक संगीत और भपंग को जीवित रखने के लिए उन्होंने सिंचाई विभाग की सरकारी नौकरी तक छोड़ दी। उनका मानना था कि यदि उन्होंने नौकरी के साथ समझौता किया, तो उनकी लोक कला धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। आज वही समर्पण उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक तक ले आया है।
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