तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक मासूम बच्चे ने अपनी सबसे प्रिय दादी को कैंसर से जूझते और जिंदगी हारते देखा। उस उम्र में उसने शायद बीमारी की गंभीरता को पूरी तरह नहीं समझा था, लेकिन इतना जरूर महसूस कर लिया था कि अपनों को खोने का दर्द कितना बड़ा होता है। उसी दिन उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि बड़ा होकर कैंसर विशेषज्ञ बनेगा, ताकि किसी और परिवार को वह पीड़ा न झेलनी पड़े। वर्षों बाद वही संकल्प उसे देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में शुमार नीट-यूजी (री-नीट) 2026 में 720 में से 715 अंक और ऑल इंडिया रैंक-1 तक ले आया।