कालों के काल उज्जैन बाबा महाकाल की श्रावण-भादौ मास में निकलने वाली दूसरी सवारी सोमवार को धूमधाम से निकाली जाएगी। वैसे तो बाबा महाकाल की सभी सवारियां पूर्ण राजसी ठाठ-बाट के साथ निकाली जाती हैं, लेकिन दूसरी सवारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती हैं। इसमें भगवान श्री चंद्रमौलेश्वर और भगवान मनमहेश भक्तों को दर्शन देते हैं। बाबा महाकाल के इन मुखारविंदों की विशेषता यह है कि दोनों एक समान होते हैं। लेकिन, एक मुखारविंद पालकी में और दूसरा हाथी पर विराजमान रहता है। श्रद्धालु यदि इनमें से किसी एक के भी दर्शन कर लें, तो उन्हें समान पुण्य लाभ प्राप्त होता है।
जब बाबा महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं, तो सबसे पहले कड़ाबीन के धमाकों से नगरवासियों को सूचित किया जाता है कि राजा पधार रहे हैं। इसके बाद पुलिस का बैंड मधुर स्वर लहरियों के साथ आगे चलता है। पुलिस के सशस्त्र जवान सवारी मार्ग पर कदमताल करते हैं। जैसे ही महाकाल राजा मंदिर से बाहर आते हैं, मुख्य द्वार पर उन्हें पुलिस विभाग की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर (सशस्त्र सलामी) दी जाती है। इसके पश्चात एक सच्चे राजा की भांति बाबा महाकाल पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकल पड़ते हैं। महाकाल मंदिर के पुजारी पंडित महेश गुरु ने बताया कि पूर्व समय में जो राजा होते थे, वे या तो पालकी में सवार होकर निकलते थे या हाथी पर। इसलिए अनादिकाल से जब से महाकाल की सवारी निकाली जा रही है, तभी से भक्तों की सुविधा के लिए यह व्यवस्था की गई कि भगवान के एक जैसे दो मुखारविंद बनवाए जाएं। एक मुखारविंद पालकी में और दूसरा हाथी पर विराजमान किया जाए।
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पुजारी महेश गुरु ने बताया कि दोनों मुखारविंद एक समान होते हैं। ऐसे में जिन श्रद्धालुओं को पालकी में विराजित महाकाल राजा के दर्शन नहीं हो पाते, वे हाथी पर सवार महाकाल के दर्शन करके भी समान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश, अधिकतर श्रद्धालुओं को इस बात की जानकारी नहीं होती और वे केवल पालकी की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे में मंदिर प्रबंध समिति इस विषय का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार करे, जिससे श्रद्धालुओं को यह जानकारी मिल सके।
ऐसा रहेगा सवारी मार्ग
श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के प्रशासक एवं अपर कलेक्टर प्रथम कौशिक ने बताया कि सवारी परंपरागत मार्ग महाकाल चौराहा, गुदरी चौराहा, बक्षी बाजार और कहारवाड़ी होती हुई रामघाट पहुंचेगी। जहां मां क्षिप्रा नदी के जल से भगवान का अभिषेक और पूजन-अर्चन किया जाएगा। इसके बाद सवारी रामानुजकोट, मोढ की धर्मशाला, कार्तिक चौक खाती का मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, ढाबा रोड, टंकी चौराहा, छत्री चौक, गोपाल मंदिर, पटनी बाजार और गुदरी बाजार से होती हुई पुन: श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचेगी।
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आठ जनजातीय एवं लोक नृत्य कलाकारों के दल सहभागिता करेंगे
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मंशानुरूप बाबा श्री महाकालेश्वर की सवारी को भव्य स्वरूप देने के लिए आठ जनजातीय कलाकारों का दल श्री महाकालेश्वर भगवान की दूसरी सवारी में सहभागिता करेगा। इसमें अज्जू सिसोदिया के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में झाबुआ का भगोरिया नृत्य, छवीलदास भावली के नेतृत्व में नाशिक महाराष्ट्र के जनजातीय सौगी मुखोटा नृत्य, बनसिंह भाई गुजरात जनजातीय राठ नृत्य, खेमराज राजस्थान का गैर-घूमरा जनजातीय नृत्य सम्मिलित है। यह सभी दल श्री महाकालेश्वर भगवान की सवारी के साथ सम्पूर्ण सवारी मार्ग में अपनी प्रस्तुति देते हुए चलेंगे। इन दलों के अतिरिक्त ओडिशा के लोकनृत्य शंख ध्वनि सुनील कुमार साहू के नेतृत्व में व छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य लोकपंथी का दल दिनेश कुमार जागड़े के नेतृत्व में श्री महाकालेश्वर भगवान के सवारी के आगमन पर रामघाट पर प्रस्तुति दी जाएगी। साथ ही उसी दौरान अजय कुमार के नेतृत्व में हरियाणा का लोकनृत्य हरियाणवी घूमर और मध्यप्रदेश छतरपुर के बरेदी लोकनृत्य दल रवि अहिरवार के साथ क्षिप्रा तट के दूसरी ओर दत्तअखाड़ा क्षेत्र पर श्री महाकालेश्वर भगवान के सवारी के रामघाट आगमन पर प्रस्तुति देंगे। सभी जनजातीय दल संस्कृति विभाग भोपाल, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद व त्रिवेणी कला एवं पुरातत्वव संग्रहालय के माध्यम से भगवान श्री महाकालेश्वर की दूसरी सवारी सहभागिता करेंगे।