सागर के जिला अस्पताल में भर्ती एक बेसहारा महिला की तीन महीने की बच्ची का अवैध रूप से दत्तक ग्रहण कर पहचान बदलने का मामला सामने आया है। मामला सामने आने के बाद बाल संरक्षण आयोग के सदस्य और हिंदू संगठन के लोग जिला अस्पताल पहुंच गए। अस्पताल में भर्ती एक गरीब महिला की मदद के नाम पर शनिचरी के एक परिवार ने भावनात्मक रूप से सहारा देकर मासूम को अपने कब्जे में ले लिया।
शनिचरी के इस परिवार ने बच्ची को अस्पताल के दूसरे विभाग में भर्ती कराया, जहां उसका नाम और पहचान बदलकर देखरेख शुरू कर दी। मामला सामने आने के बाद बाल कल्याण समिति द्वारा की गई जांच पड़ताल में विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजीपीयू) की लापरवाही सामने आई है। समिति सदस्यों का कहना है कि पूरे मामले में एसजीपीयू ने गंभीर लापरवाही बरती गई है, जिसके कारण नवजात बालिका को अवैधानिक तरीके से एक परिवार ने अपने संरक्षण में लिया है।
दस्तावेज परीक्षण में पता चली ये बात
बाल कल्याण समिति सदस्यों ने जिला अस्पताल का निरीक्षण किया। जहां दस्तावेज परीक्षण के बाद पता चला कि बच्ची का नाम, माता-पिता का नाम परिवर्तित कर उसे भर्ती कराया गया है। बाल आश्रम पहुंचकर मृतका के बेटे की काउंसलिंग की तो उसने बताया कि उसकी एक छोटी बहन भी है, जिसे अस्पताल में एक आंटी ले गई थी। इस पूरे मामले में हिंदू सेवा समिति के अध्यक्ष उमेश सराफ का कहना है, जिला अस्पताल में एक महिला अपने बच्चों के साथ इलाज करने के लिए आई थी, महिला की हालत गंभीर थी। बच्ची की हालत भी गंभीर थी। बच्ची की हालत को देखते हुए उसे डॉक्टरों ने बाजू में इलाज कर रहे परिवार को सुपुर्द कर दिया और उसे दूसरे वार्ड में भर्ती कर दिया गया। जहां बच्ची की मां नाम बदलकर फातिमा कर दिया गया। बच्ची का नाम बदलकर आसमां कर दिया गया।
अस्पताल में इलाज करने वाले डॉक्टरों की गलती है, जो यहां पर इलाज कर रहे हैं। हर हॉस्पिटल में इस तरह का खेल चल रहा है। वहीं, बच्ची को ले जाने वाली महिला का कहना है कि बच्ची की मां की हालत गंभीर थी बच्ची की हालत भी गंभीर थी। उसे कोई नहीं उठा रहा था, बच्ची की मां ने बोला तो हमने उसे उठाया। तीन महीने की बच्ची थी, इसकी मां का नाम पता नहीं है। बच्ची की मां का नाम विमला है। बच्ची की मां का नाम फातमा लिखा आया था। सबके सामने हमने बच्ची को लिया था, कोई लिखित नहीं है बच्ची को लेने की।
यह है पूरा मामला
गुना जिले की रहने वाली महिला की 17 फरवरी की रात बीएमसी में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। मृतका के साथ उसका पांच साल का बेटा था, जिसे बाल आश्रम भेज दिया गया था। दो दिन बाद जानकारी मिली कि मृतका की दो महीने की एक बेटी भी है। समिति सदस्यों ने जब एसजीपीयू से बात की तो उनका कहना था कि उन्हें बच्ची के संबंध में कोई जानकारी नहीं है। बाल कल्याण समिति के निर्देश पर एसजीपीयू ने जिला अस्पताल पहुंचकर जानकारी जुटाई तो पता चला कि मृतका की दो महीने की बेटी है, जिसे एक परिवार द्वारा अपने संरक्षण में ले लिया है।