मोहन सरकार द्वारा पेश ताजा बजट को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सरकार ने जहां इस बजट को विकासोन्मुख और किसान हितैषी बताया है, वहीं जमीन पर कई किसान इसे उम्मीदों से कम और लोक-लुभावन करार दे रहे हैं।
खकनार निवासी किसान रवि कुमार ने साफ कहा कि यह बजट किसानों के हित में नजर नहीं आता। उनके मुताबिक खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बजट में खाद, बीज और कृषि सामग्री पर ठोस राहत का अभाव है। किसान राहुल राठौड़ ने तो इसे जीरो बजट बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझने में असफल रही है।
नागझरी निवासी किसान संजय चौकसे ने भी बजट को किसानों के अनुकूल नहीं माना। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में किसान हितैषी होती, तो खाद-बीज और कृषि उपकरणों पर सब्सिडी बढ़ाने जैसे निर्णय लिए जाते। बसाली के किसान बद्री के अनुसार सरकार ने बजट में घोषणाएं तो बड़ी-बड़ी की हैं लेकिन इसका सीधा लाभ किसानों तक पहुंचेगा या नहीं, इस पर संदेह बना हुआ है।
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हालांकि कुछ किसानों की राय संतुलित भी रही। पांगरी निवासी किसान नंदू पटेल ने कहा कि बजट पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन जिन किसानों की जमीन विभिन्न परियोजनाओं में चली गई है, उनके पुनर्वास और मुआवजे पर विशेष प्रावधान होना चाहिए था।
कुल मिलाकर गांवों में बजट को लेकर असंतोष ज्यादा दिखाई दे रहा है। किसान मानते हैं कि बढ़ती लागत, घटती आमदनी और बाजार की अनिश्चितता के दौर में उन्हें ठोस आर्थिक राहत की जरूरत थी। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या बजट की घोषणाएं खेत तक पहुंचेंगी या फिर यह भी कागजों तक सीमित रह जाएंगी? आने वाला समय तय करेगा कि यह बजट किसानों के लिए संबल बनेगा या सिर्फ सियासी दस्तावेज साबित होगा।