मुहर्रम की पहली तारीख पर बुधवार को बड़ा इमामबाड़ा से पारंपरिक शाही जरी का जुलूस पूरे गम और अकीदत के साथ निकाला गया। जुलूस अपने निर्धारित मार्ग से होते हुए छोटे इमामबाड़ा पहुंचा। इस दौरान बड़ी संख्या में अकीदतमंद जुलूस में शामिल होकर नौहाख्वानी और मातम करते रहे। "या हुसैन", "या अली" और "लब्बैक या हुसैन" की सदाएं पूरे रास्ते गूंजती रहीं। जुलूस के इस्तकबाल के लिए जगह-जगह लोग खड़े रहे। मातमी दस्ते सीना जनी करते हुए आगे-आगे चलते रहे, जबकि हजारों अकीदतमंद उनके साथ गम-ए-हुसैन का इजहार करते हुए शामिल रहे। पूरे मार्ग पर अजादारी का माहौल रहा और सुरक्षा व्यवस्था के बीच जुलूस छोटे इमामबाड़ा पहुंचकर संपन्न हुआ।