ललितपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश के प्रादेशिक महामंत्री डॉ. महेश पांडेय बजरंग ने कहा कि संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की परंपरा लगातार क्षीण होती जा रही है। ऐसे समय में गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य स्वबोध और विश्वबोध के सूत्रों से परिपूर्ण है, जिसे समझने और आत्मसात करने की जरूरत है। पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण के कारण हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर होते जा रहे हैं। वह शुक्रवार को नेहरू महाविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश शास्त्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वेद सभी धर्मों का मूल हैं। ऋषि-मुनियों ने वेद, पुराण, रामायण, श्रीमद्भागवत और गीता जैसे लोककल्याणकारी ग्रंथों की अमूल्य धरोहर दी है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार को इन ग्रंथों को अपनाकर नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से जोड़ना चाहिए। डीवी कॉलेज उरई के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. नीरज कुमार द्विवेदी ने महर्षि वेदव्यास के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कर्म, साधना, उपासना, सत्कर्म और सत्संग के बिना मानव जीवन का कल्याण संभव नहीं है। मैथिलीशरण गुप्त महाविद्यालय, चिरगांव के प्राचार्य डॉ. आशीष तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा युवाओं की सोच से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। ऐसे आयोजन भारतीय चिंतन और महर्षि वेदव्यास के योगदान को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, कटनी की सहायक आचार्या डॉ. नेहा मिश्रा ने भारतीय वैदिक परंपरा में आत्मबोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आत्मबोध से ही परोपकार और मानवीय मूल्यों का विकास होता है। संगोष्ठी में हिमांश धर द्विवेदी, डॉ. सुधाकर उपाध्याय, डॉ. दीपक पाठक सहित विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। महाविद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष शरद खैरा ने कहा कि दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी से शोधार्थियों और विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कार और नैतिक मूल्यों को समझने का अवसर मिला। समापन अवसर पर अतिथियों को स्मृति-चिह्न एवं शॉल भेंटकर सम्मानित किया गया। संचालन डॉ. दीपक पाठक ने तथा आभार हरदयाल सिंह लोधी ने व्यक्त किया। इस दौरान प्रो. आशा साहू, प्रो. अनिल सूर्यवंशी, हिमांश धर द्विवेदी, डॉ. संजीव कुमार, डॉ. रिचाराज सक्सेना, कविता पैजवार, डॉ. रेनू चंदेल, श्वेता आनंद, डॉ. वर्षा साहू और डॉ. ऊषा तिवारी सहित अनेक शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे। भारतीय ज्ञान परंपरा में बौद्ध धर्म की अहम भूमिका राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में संस्कृत विभाग की सहायक आचार्या डॉ. प्रीति सिरौटिया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विभिन्न चिंतन धाराओं का समन्वय है, जिसमें बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बौद्ध धर्म के 'अप्प दीपो भव' (स्वयं अपना दीपक बनो) सूत्र का उल्लेख करते हुए आत्मबोध और आत्मनिर्भरता के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।