विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने देश में “अल्पसंख्यक” शब्द की स्पष्ट और कानूनी परिभाषा तय करने की मांग को लेकर एक नया अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है। संगठन का कहना है कि वर्तमान में भारत में अल्पसंख्यक की कोई स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा नहीं है, बल्कि यह दर्जा केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना के माध्यम से कुछ समुदायों को दिया गया है। विहिप का तर्क है कि जब तक अल्पसंख्यक की सटीक परिभाषा तय नहीं होगी, तब तक इससे जुड़ी नीतियों और योजनाओं में पारदर्शिता और संतुलन नहीं आ पाएगा। इसी मुद्दे को लेकर विहिप देशभर के सांसदों से मुलाकात करेगी और संसद में इस विषय को उठाने की अपील करेगी। संगठन के नेताओं का कहना है कि वे विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपेंगे और यह मांग करेंगे कि संसद में इस विषय पर गंभीर चर्चा कर अल्पसंख्यक शब्द की स्पष्ट परिभाषा तय की जाए।
विहिप का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में राष्ट्रीय स्तर पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया जाता है, जबकि कई राज्यों में वही समुदाय बहुसंख्यक भी हो सकता है। इसलिए संगठन का सुझाव है कि अल्पसंख्यक का निर्धारण राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य स्तर पर किया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक जनसंख्या अनुपात के आधार पर समुदायों को लाभ मिल सके। इस मुद्दे को लेकर विहिप लंबे समय से अपनी राय रखती रही है, लेकिन अब संगठन इसे अधिक संगठित तरीके से उठाने की तैयारी कर रहा है। विहिप पदाधिकारियों के अनुसार वे जल्द ही संसद के दोनों सदनों के सांसदों से मिलकर इस विषय पर समर्थन जुटाने का प्रयास करेंगे।
इस मांग के पीछे संगठन का यह भी तर्क है कि कई सरकारी योजनाएं और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाली विशेष सुविधाएं अल्पसंख्यक समुदायों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। यदि अल्पसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा तय हो जाएगी तो इन योजनाओं का लाभ सही समुदायों तक अधिक पारदर्शिता के साथ पहुंच सकेगा। विहिप का कहना है कि यह कदम किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल नीति व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनाना है।
हालांकि इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग मत भी सामने आ सकते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करना एक जटिल संवैधानिक और सामाजिक विषय है, जिस पर व्यापक बहस की आवश्यकता होगी। फिर भी विहिप का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होना जरूरी है। संगठन उम्मीद जता रहा है कि सांसद इस विषय को गंभीरता से लेते हुए संसद में इस पर विचार-विमर्श शुरू करेंगे, जिससे भविष्य में अल्पसंख्यक से जुड़ी नीतियों और अधिकारों को लेकर स्पष्टता आ सके।