उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के बाद जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में लगभग 2.88 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला चर्चा में है। यह प्रक्रिया चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के तहत की गई, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद त्रुटियों को दूर करना था। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के अनुसार, पहले प्रदेश में कुल लगभग 15.44 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे, लेकिन पुनरीक्षण के बाद जारी ड्राफ्ट सूची में लगभग 12.55 करोड़ मतदाताओं के नाम ही शामिल किए गए, जबकि करीब 2.88–2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए। यह कुल मतदाताओं का लगभग 18.7 प्रतिशत है।
चुनाव आयोग के अनुसार जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो या तो मृत पाए गए, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए, या फिर एक से अधिक जगह पर पंजीकृत थे। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक हटाए गए नामों में लगभग 2.17 करोड़ ऐसे मतदाता थे जो स्थानांतरित हो चुके थे या सत्यापन के दौरान नहीं मिले, करीब 46.23 लाख मतदाता मृत पाए गए, जबकि लगभग 25.47 लाख लोगों के नाम दो या अधिक जगहों पर दर्ज थे। इसके अलावा कुछ मामलों में सत्यापन फॉर्म जमा नहीं होने या रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण भी नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए गए।
यह पूरा अभियान नवंबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच चलाया गया, जिसमें बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया। इस दौरान प्रत्येक मतदाता से एक एन्यूमरेशन फॉर्म भरवाया गया। जिन लोगों के फॉर्म जमा नहीं हुए या जिनकी जानकारी सत्यापित नहीं हो सकी, उनके नाम अस्थायी रूप से ड्राफ्ट सूची से हटा दिए गए। हालांकि चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह अंतिम सूची नहीं है और जिन लोगों के नाम हट गए हैं, उन्हें दोबारा अपना नाम जुड़वाने का अवसर दिया जाएगा। इसके लिए वे फॉर्म-6 भरकर दावा प्रस्तुत कर सकते हैं, जबकि किसी नाम को हटाने या सुधार के लिए फॉर्म-7 के जरिए आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है।
ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। विपक्षी दलों, खासकर समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। वहीं चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और इसका उद्देश्य केवल मतदाता सूची को साफ-सुथरा और सटीक बनाना है। आयोग के मुताबिक अंतिम मतदाता सूची दावे और आपत्तियों की जांच के बाद जारी की जाएगी। कुल मिलाकर, यूपी में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.88 करोड़ नाम हटाए जाने का मामला प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक बहस का भी विषय बन गया है।