भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ऐसे वक्त ढाका क्यों पहुँचे हैं, जब भारत-बांग्लादेश रिश्तों में सब कुछ सामान्य नहीं माना जा रहा? क्या यह दौरा सिर्फ बेगम खालिदा जिया को श्रद्धांजलि देने तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ी कूटनीतिक रणनीति छिपी है? तारिक रहमान से हुई मुलाकात क्या महज शिष्टाचार है या आने वाले चुनावों से पहले एक नया राजनीतिक संदेश? जब बांग्लादेश में अवामी लीग चुनावी दौड़ से बाहर है, तो क्या भारत अब बीएनपी के साथ नए सिरे से रिश्ते गढ़ने की तैयारी में है? और क्या खालिदा जिया के निधन के बहाने भारत अपने पड़ोसी देश के साथ तल्ख़ी कम करने की कोशिश कर रहा है?
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ऐसे वक्त ढाका पहुँचे हैं, जब भारत-बांग्लादेश संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं कहे जा सकते। औपचारिक तौर पर यह दौरा बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया को श्रद्धांजलि देने के लिए है, लेकिन इसके राजनीतिक और कूटनीतिक निहितार्थ कहीं ज्यादा गहरे माने जा रहे हैं। खासकर तब, जब बांग्लादेश में अगले साल फरवरी में आम चुनाव होने हैं और सियासी तस्वीर तेजी से बदल रही है।
बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रियाज हमिदुल्लाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक अहम तस्वीर साझा की है, जिसमें एस. जयशंकर की मुलाकात खालिदा जिया के बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक़ रहमान से होती दिख रही है। तस्वीर साझा करते हुए हमिदुल्लाह ने लिखा कि विदेश मंत्री भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में खालिदा जिया को श्रद्धांजलि देने ढाका आए हैं। लेकिन कूटनीतिक हलकों में इस मुलाकात को भविष्य की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
मंगलवार को खालिदा जिया का निधन उनके बेटे तारिक़ रहमान के बांग्लादेश लौटने के महज पाँच दिन बाद हुआ। तारिक़ रहमान पिछले 17 वर्षों से ब्रिटेन में निर्वासन की जिंदगी जी रहे थे। अब उनकी वापसी और माँ के निधन के बाद BNP के भीतर नेतृत्व और भावनात्मक समर्थन दोनों मजबूत होते दिख रहे हैं। ऐसे में जयशंकर की मौजूदगी और तारिक़ रहमान से मुलाकात को भारत की बदली रणनीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
दिलचस्प यह भी है कि इसी बीच पाकिस्तान अपनी नेशनल असेंबली के स्पीकर अयाज़ सादिक़ को ढाका भेज रहा है। यानी ढाका इस समय दक्षिण एशियाई कूटनीति का एक अहम केंद्र बनता जा रहा है।
बांग्लादेश में फरवरी में चुनाव प्रस्तावित हैं और इस बार अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। दशकों से भारत अवामी लीग और शेख़ हसीना का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। जब-जब शेख़ हसीना सत्ता में रहीं, भारत-बांग्लादेश संबंधों में गर्मजोशी साफ दिखी। लेकिन मौजूदा हालात में अवामी लीग विकल्प नहीं रह गई है। ऐसे में भारत के सामने कूटनीतिक मजबूरी है कि वह बांग्लादेश की उन राजनीतिक ताकतों से संवाद बढ़ाए, जो सत्ता में आ सकती हैं। इस संदर्भ में BNP को अब भारत एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखता नजर आ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खालिदा जिया के निधन पर न सिर्फ शोक जताया, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका की खुलकर सराहना की। इससे पहले जब खालिदा जिया गंभीर रूप से बीमार थीं, तब पीएम मोदी ने उनके इलाज में मदद की पेशकश की थी, जिसके लिए BNP ने सार्वजनिक तौर पर आभार जताया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सब महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत के रुख़ में आई नरमी का संकेत है।
यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने ढाका में बदले हालात को समझने की कोशिश की हो। दिसंबर 2024 में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस से मिलने ढाका पहुँचे थे। उस दौरे को भी भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं की जमीन टटोलने के तौर पर देखा गया था।
एस. जयशंकर का यह दौरा बताता है कि भारत अब बांग्लादेश को सिर्फ पुराने सहयोगियों के चश्मे से नहीं देख रहा। बदलते राजनीतिक समीकरणों में नई बातचीत, नए संपर्क और नई संभावनाओं की तलाश शुरू हो चुकी है। खालिदा जिया को दी गई श्रद्धांजलि के साथ-साथ यह दौरा इस बात का भी संकेत है कि भारत आने वाले समय में बांग्लादेश के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की तैयारी में है।