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Jageshwar Prasad Avadhiya: 100 रु के झूठे केस में 39 साल हुए बर्बाद, न्याय की आस में चौपट हुई जिंदगी

Fri, 26 Sep 2025 12:54 AM IST
भास्कर तिवारी वीडियो डेस्क, अमर उजाला डॉट कॉम


छत्तीसगढ़ के रायपुर के 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया पर 1986 में 100 रुपये की रिश्वत लेने का झूठा आरोप लगाया गया था। इस मामले ने उनके जीवन के 39 साल बर्बाद कर दिए। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उन्हें बेकसूर घोषित करते हुए बरी कर दिया।

वो कहते हैं, "अशोक वर्मा नाम का एक हेल्पर मेरे पास आया और अपनी पिछली सैलरी का बिल बनाने को कहा.मैंने कहा कि जब मुझे निर्देश मिलेंगे तब बिल बना दूँगा. वो तीसरी बार आया था, उसके पिता पुलिस में थे। वो एसपी और पूरी टीम के साथ आया था. जैसे ही मैं घर से 30-40 कदम बाहर निकला, उन्होंने मेरी जेब में पैसे डाल दिए। मैंने देखा. कोई आया और बताया कि वो विजिलेंस (केंद्रीय सतर्कता आयोग) से है और मुझे पुलिस चौक ले आया. उन्होंने मेरे घर पर छापा मारा. मेरा मुख्यालय भोपाल में था। मैंने अपने नियोक्ता को लिखा. कोर्ट में केस शुरू हुआ. मेरे विभाग के सभी लोगों ने मेरा पक्ष लिया, लेकिन मजिस्ट्रेट फिर भी नहीं माने. उन्होंने मेरा बहुत समय बर्बाद किया.मेरी पत्नी की जान चली गई.मेरे पास आय का कोई स्रोत नहीं है, कोई पेंशन नहीं है, और मुझे मेरा पिछला वेतन नहीं मिला है... मैं मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और सीआईडीसी कार्यालय के संजय ओझा से अनुरोध करता हूँ कि वे मेरी मदद करें.पेंशन.लोगों ने मुझ पर पैसे हड़पने का आरोप लगाया.मुझे 39 साल बाद न्याय मिला है इस झूठे केस ने न केवल उनकी नौकरी छीन ली, बल्कि उनके परिवार और सम्मान को भी भारी क्षति पहुँचाई। उन्हें अपनी नौकरी से निलंबित कर दिया गया था, जिससे उनकी आय आधी हो गई। उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और उनकी पत्नी का निधन भी इसी सदमे के कारण हुआ। यह मामला "देरी से मिला न्याय, एक तरह का अन्याय है" की कहावत को दर्शाता है। जागेश्वर प्रसाद अवधिया का कहना है कि वे न्याय तो पा गए, लेकिन उनकी पूरी जिंदगी इस झूठे आरोप के कारण तबाह हो गई। अब वे सरकार से अपनी बकाया पेंशन और कुछ आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं ताकि वे अपने जीवन के बचे हुए दिन शांति से गुजार सकें।

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