यूरोप इन दिनों रिकॉर्डतोड़ गर्मी की चपेट में है। कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। सड़कें पिघल रही हैं, रेलवे सेवाएं प्रभावित हैं और अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर दुनिया के सबसे विकसित क्षेत्रों में से एक यूरोप के लाखों घरों, स्कूलों और यहां तक कि अस्पतालों में भी एयर कंडीशनर यानी एसी क्यों नहीं हैं? इसके पीछे सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि इतिहास, पर्यावरण, कानून और शहरी योजना से जुड़ी कई वजहें हैं।
यूरोप इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। फ्रांस, स्पेन, इटली और ब्रिटेन समेत कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई शहरों में सड़कें पिघलने लगी हैं, ट्राम की पटरियां टेढ़ी हो गई हैं, रेल सेवाएं बाधित हैं, बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ गई है।
इन हालात के बीच सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल यही है कि आखिर यूरोप के इतने बड़े हिस्से में अब भी एयर कंडीशनर क्यों नहीं हैं? खासकर तब, जब एशिया और अमेरिका जैसे क्षेत्रों में एसी सामान्य सुविधा बन चुका है।
दरअसल, यूरोप में लंबे समय तक एसी को जरूरत नहीं, बल्कि अतिरिक्त सुविधा माना गया। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां का पारंपरिक मौसम था, जहां पहले 40 डिग्री तापमान बेहद दुर्लभ माना जाता था। अधिकांश इमारतें और शहर उस दौर में बनाए गए, जब इतनी भीषण गर्मी की कल्पना भी नहीं की जाती थी।
लेकिन केवल मौसम ही वजह नहीं है। यूरोप के कई देशों में ऐतिहासिक इमारतों की सुंदरता बचाने के लिए भवनों के बाहरी हिस्से पर एसी यूनिट लगाने पर कड़े नियम हैं। खासकर फ्रांस की राजधानी पेरिस में पुरानी चूना-पत्थर की इमारतों पर बाहर दिखाई देने वाले एसी लगाने की अनुमति आसानी से नहीं मिलती।
पेरिस की डिप्टी मेयर ऑद्रे पुलवार का कहना है कि शहर को ऐसी शक्ल नहीं देना चाहते, जहां हर इमारत के बाहर एसी की मशीनें लटकी दिखाई दें। उनके मुताबिक, इससे न केवल ऐतिहासिक विरासत प्रभावित होती है, बल्कि शोर और गर्म हवा का उत्सर्जन भी बढ़ता है।
यूरोप में एसी लगाने की राह में एक और बड़ी बाधा है वो है शोर। कई देशों में अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों को एसी लगाने से पहले पड़ोसियों और हाउसिंग सोसायटी की मंजूरी लेनी पड़ती है। फ्रांस में यदि एसी निर्धारित सीमा से अधिक आवाज करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
यही वजह है कि पेरिस के निवासी लूका फुनारो, जो एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित हैं, पिछले दो वर्षों से अपने घर में एसी लगाने की अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन पड़ोसियों की आपत्ति के कारण उन्हें अब तक मंजूरी नहीं मिल सकी।
यूरोप की जलवायु नीति भी एसी को लेकर सतर्क रही है। सरकारों का मानना रहा कि एसी अधिक बिजली की खपत करते हैं और कार्बन उत्सर्जन बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन की समस्या को और गंभीर बना सकते हैं। इसलिए दशकों तक बेहतर इन्सुलेशन, प्राकृतिक वेंटिलेशन, खिड़कियों पर शटर, पेड़-पौधे लगाने और हरित शहरों के विकास पर ज्यादा जोर दिया गया।
हालांकि अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव पहले से ज्यादा लंबी, अधिक तीव्र और बार-बार आने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्राकृतिक वेंटिलेशन या हरियाली अब पर्याप्त नहीं रह गई है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल यानी आईपीसीसी का भी कहना है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान लोगों की जान बचाने के लिए एयर कंडीशनिंग सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की जलवायु वैज्ञानिक राधिका खोसला का मानना है कि भविष्य में बेहतर भवन डिजाइन और जरूरत के अनुसार एसी दोनों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी होगा।
फ्रांस की जलवायु मंत्री मोनिक बारबू भी मानती हैं कि हर जगह एसी लगाना व्यावहारिक समाधान नहीं है। उनका कहना है कि केवल एसी लगाने से जंगलों में लगने वाली आग नहीं रुकेगी और न ही सूखे जैसी समस्याएं खत्म होंगी। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटने के व्यापक उपायों की भी जरूरत है।
आंकड़े भी यूरोप की स्थिति को साफ बताते हैं। फ्रांस के केवल करीब 25 प्रतिशत घरों में एसी है, ब्रिटेन में यह आंकड़ा महज पांच प्रतिशत है, जबकि इटली में लगभग 56 प्रतिशत घरों में एयर कंडीशनर मौजूद हैं।
हाल की भीषण गर्मी के कारण हजारों स्कूलों को बंद करना पड़ा, कई उद्योगों ने कामकाज सीमित कर दिया और रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा। अर्थशास्त्रियों ने इन परिस्थितियों की तुलना कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पैदा हुई चुनौतियों से की है।
अब एसी केवल सुविधा नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन पूरे देश में बड़े पैमाने पर एसी लगाने की मांग कर रही हैं। वहीं लंदन के मेयर सादिक खान ने भी स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों में आधुनिक कूलिंग सिस्टम विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
कुल मिलाकर, यूरोप आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जहां कभी एसी को पर्यावरण और विरासत के लिए खतरा माना जाता था, वहीं अब लगातार बढ़ती हीटवेव ने इसे जनस्वास्थ्य और सुरक्षा का अहम हिस्सा बना दिया है। आने वाले वर्षों में यूरोप को अपनी जलवायु नीति, शहरी योजना और बुनियादी ढांचे के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा, जो लोगों को भीषण गर्मी से भी बचाए और पर्यावरणीय लक्ष्यों को भी सुरक्षित रख सके।