शुगर बोर्ड एक सूचनात्मक डिस्प्ले बोर्ड होता है जिसे स्कूलों में लगाया जाता है। इसका मकसद विद्यार्थियों और अभिभावकों को ये बताना है कि सामान्य खाद्य पदार्थों—जैसे जूस, फ्लेवर्ड योगर्ट, कोल्ड ड्रिंक, ब्रेकफास्ट में छिपी हुई चीनी कितनी होती है और वह बच्चों की सेहत पर क्या असर डालती है। इसी पर खास बातचीत की हमने डॉ. दिव्या गुप्ता से जिन्होंने स्कूलों में शुगर बोर्ड को जगह दिलाई। बच्चों में डायबिटीज (मधुमेह) अब तेजी से बढ़ती समस्या बनती जा रही है। पहले इसे “बड़ों की बीमारी” माना जाता था, लेकिन बदलती खान-पान की आदतें, लाइफस्टाइल और मोटापा बच्चों में भी डायबिटीज का खतरा बढ़ा रहे हैं।बच्चों का लगभग 13–15% दैनिक कैलोरी शुगर से आता है जबकि WHO की सलाह केवल 5% तक है। यही कारण है कि हाल ही में CBSE ने स्कूलों में “शुगर बोर्ड” लगाने का निर्देश दिया है ताकि बच्चे और अभिभावक समझ सकें कि रोज़ाना खाए जाने वाले खाने-पीने में कितनी शुगर छिपी होती है और डायबिटीज का खतरा कितना गंभीर है। एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि कार्बोहाइड्रेट, खास तौर पर कोल्ड ड्रिंक और मैदा युक्त खाद्य पदार्थ, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की तुलना में ऊर्जा और कैलोरी के अपेक्षाकृत सस्ते स्रोत हैं। इसलिए, एक ही राशि खर्च करने पर प्रोटीन युक्त भोजन की तुलना में कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन की अधिक मात्रा मिलती है। परिणामस्वरूप, जब कोई व्यक्ति ऐसे कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन का अधिक सेवन करना शुरू करता है, साथ ही व्यायाम की कमी के कारण मोटापा बढ़ता है। हालांकि, ऐसा कोई डेटा नहीं है जो दिखाता हो कि बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) बनाए रखने पर कम मात्रा में मिठाई खाने से मधुमेह होता है। इसलिए कोई मिठाई खा सकता है, लेकिन कम मात्रा में।