भारत तेजी से तैयार पेट्रोलियम उत्पादों के एक महत्वपूर्ण वैश्विक निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी ताकत देश की विशाल और आधुनिक रिफाइनिंग क्षमता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 तक भारत की स्थापित तेल शोधन क्षमता लगभग 267.1 मिलियन टन प्रति वर्ष (MMTPA) है। सरकार के अनुसार यह क्षमता 2030 तक करीब 309.5 MMTPA तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत की रणनीति अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमत पर विभिन्न देशों से कच्चा तेल खरीदकर उसे पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और अन्य उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदलकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचने की है। इस मॉडल से भारत एक तरफ कच्चे तेल के आयात पर अपनी रिफाइनिंग क्षमता का लाभ उठाता है, तो दूसरी तरफ तैयार उत्पादों के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित करता है।
भारत की रिफाइनिंग व्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited के अलावा Reliance Industries और Nayara Energy जैसी कंपनियों की बड़ी रिफाइनरियां हैं। गुजरात के जामनगर में रिलायंस की रिफाइनिंग परिसंपत्तियां विशेष रूप से बड़ी हैं। भारत की कुल क्षमता का पैमाना और जटिल रिफाइनिंग तकनीक उसे अलग-अलग गुणवत्ता वाले कच्चे तेल को उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने में सक्षम बनाती है। यही वजह है कि वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान आने पर भारतीय रिफाइनरियां अतिरिक्त मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालिया भू-राजनीतिक तनावों के दौरान भारत को वैश्विक बाजार में एक तरह के 'स्विंग सप्लायर' के रूप में भी देखा जा रहा है।
इस विस्तार का सबसे ताजा उदाहरण मॉरीशस के साथ पांच वर्ष का ईंधन आपूर्ति समझौता है। 20 अगस्त 2026 को भारत और मॉरीशस के बीच तेल एवं गैस क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता हुआ तथा Indian Oil Corporation Limited और मॉरीशस की State Trading Corporation के बीच दीर्घकालिक Sales and Purchase Agreement हुआ। इसके तहत भारत मॉरीशस की मोटर स्पिरिट यानी पेट्रोल, हाई-स्पीड डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की पूरी आयात आवश्यकता पूरी करेगा। भारत सरकार के अनुसार यह किसी भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनी का दक्षिण एशिया के बाहर हाल के वर्षों में पहला ऐसा दीर्घकालिक आपूर्ति समझौता है।
मॉरीशस के साथ समझौते का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर में स्थित मॉरीशस के लिए लगातार और भरोसेमंद ईंधन आपूर्ति ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष और समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण वैश्विक तेल बाजार में कीमतों तथा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसे समय में पांच साल की निश्चित आपूर्ति व्यवस्था मॉरीशस को बाहरी झटकों और कीमतों की अस्थिरता से बचाने में मदद कर सकती है। भारत के लिए भी यह समझौता हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी ऊर्जा-आधारित रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का अवसर है। मॉरीशस सरकार ने भी इसे ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया है।
भारत पहले से ही पड़ोसी देशों के पेट्रोलियम बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नेपाल और भूटान जैसे देशों को भारतीय रिफाइनरियों से पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति होती है। 2024 के व्यापार आंकड़ों में भारत से पेट्रोलियम उत्पादों के प्रमुख खरीदारों में मॉरीशस, जॉर्डन, भूटान और इटली जैसे देश दिखाई देते हैं। इसके अलावा भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की पहुंच यूरोप, अफ्रीका और एशिया के विभिन्न बाजारों तक बढ़ रही है। स्पेन, इटली, तंजानिया और जॉर्डन जैसे बाजारों में भी भारतीय उत्पादों की मौजूदगी इस व्यापक निर्यात नेटवर्क को दर्शाती है।