प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीन बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा आज भी प्रचलित है। मंडी, शिमला और कुल्लू के कई जिलों में मार्गशीष की अमावस्या को पूरी रातभर लोग अग्नि प्रज्वलित कर इसके चारों ओर परिक्रमा कर अग्नि की सुरक्षा करते हैं और जनता इस परंपरा को आज भी एक बहुत बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। आनी में धोगी, कुईंर, देउरी, कोट और निरमंड में बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा आज भी प्राचीन है, जिसे लोगों ने धूमधाम के साथ मनाया। ऋग्वेद के अनुसार इंद्रदेव और बृत्रासुर के बीच काफी समय तक युद्ध हुआ था, जिसमें इंद्रदेव ने बृत्रासुर का बध कर विजयी प्राप्त की थी। कहते हैं कि पानी पर बृत्रासुर का आधिपत्य था, जबकि अग्नि पर इंद्रदेव का। पानी का आदिपत्य बृत्रासुर के पास होने पर लोग पानी के लिए त्राहि-त्राहि करने लगे।