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Kinnaur: ऐतिहासिक राउलाने देखने देशभर से पहुंचे हजारों पर्यटक, ब्लॉगर, रिसर्च स्कॉलर

जनजातीय जिले किनौर के कल्पा गांव में मनाए जा रहे ऐतिहासिक राउलाने उत्सव में देश भर से हजारों ब्लॉगर, पर्यटक और रिसर्च स्कॉलर पहुंचे हैं। हालात यह है कि कार्यक्रम स्थल पर खड़े तक रहने की जगह नहीं है। साथ ही राउलाने नृत्य करने वाले कलाकारों को भी भीड़ से परेशानी उठानी पड़ रही है। कल्पा की गलियों में भी पर्यटक और ब्लॉगरों की भीड़ है। इस उत्सव के पिछले साल नवंबर में फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। तभी से उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार राउलाने को देखने के हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचेंगे। राउलाने उत्सव पांच दिन तक मनाया जाता है। सस्कर त्योहार देवी चंडिका माता के आदेशों के अनुसार मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान ग्रामीण अपने घरों की साफ सफाई करके हर दिन पूजा-पाठ करते हैं। त्योहार के शुभारंभ पर कंडे (ऊंचाई वाले क्षेत्र) से आए सावनी (वन से आए देवी-देवता) की पूजा करते हैं। अंतिम दिन कंडे से आए सावनी को पूजा-पाठ के साथ ही विदाई की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस राउलाने उत्सव को मनाने का मुख्य उद्देश्य कंडे से आए सावनी को खुश करके वापस भेजना है ताकि गांव में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस मेले के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के साथ पारंपरिक परिधान में पुरुष नृत्य करते हैं। इस मेले में सिर्फ पुरुष ही भाग लेते हैं। महिलाओं के परिधान भी पुरुषों को पहनाया जाता है। इस मेले में मुख्य रूप से तीन चरित्र होते हैं। इसमें राउला, राउलाने और पुंदलु होते हैं। जो पुरुष राउला बनता हैं, उसके चेहरे को (किन्नौर में दौड़ू को बांधने के लिया उपयोग की जाने वाली) गाछी से पूरी तरह से छुपाया जाता है और कोट पेंट पहनाया जाता है। राउलाने को महिलाओं को पहनाए जाने वाले दौड़ू के साथ सोने और चांदी के आभूषण पहनाए जाते हैं। आभूषणों से पूरी तरह से चेहरे को छुपाया जाता है। तीसरा और अंतिम चरित्र पुंदलु है, जो भेड़ और बकरियों के खाल से बनाए हुए मास्क को पहन कर चेहरे को छुपा कर लोगों के साथ हंसी मजाक करते हैं। यह मेला ब्रह्मा विष्णु मंदिर से शुरू होकर नारायण नागिन देवी जी के मंदिर में संपन्न होता है। इसी तरह पांचों दिन तक यह मेला मनाया जाता है। मेले के शुरुआत में भी पुंदलुओ की ओर से पूजा पाठ किया जाता है। समापन में भी पूरी सत्य निष्ठा के साथ पूजा पाठ कर कंडे से आए सावनी को विदाई दी जाती है।

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