यमुनानगर जिले का कभी रुद्रपुर के नाम से प्रसिद्ध रहा रादौर आज भी अपने समृद्ध इतिहास, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के कारण अलग पहचान रखता है। आधुनिकता की दौड़ के बावजूद यहां की ऐतिहासिक धरोहरें बीते वैभव की गवाही देती हैं। इतिहासकारों के अनुसार 1770 में सिख मिसल करोरासिंहिया के सरदार दुल्हा सिंह संधू ने मुगल शासन को पराजित कर रादौर को अपनी राजधानी बनाया। उनके शासनकाल में क्षेत्र का राजनीतिक और आर्थिक महत्व बढ़ा। बाद में रानी आनंद कंवर ने बदलते हालात में अंग्रेजों से संधि की, जिसके बाद रियासत ब्रिटिश संरक्षण में चली गई। रादौर की पहचान उसकी प्राचीन हवेलियों और ऐतिहासिक इमारतों से भी जुड़ी है। करीब 200 वर्ष पुरानी हवेली 52 हजारी अपनी नक्काशीदार खिड़कियों, विशाल दरवाजों और पारंपरिक स्थापत्य के कारण आकर्षण का केंद्र है। कस्बे में मौजूद पुराने गुंबद और अन्य संरचनाएं भी इसके समृद्ध अतीत की याद दिलाती हैं। धार्मिक दृष्टि से भी रादौर का विशेष महत्व है। धूनीधर मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर और गोगामेड़ी श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। गोगामेड़ी में लगने वाला छड़ी मेला हरियाणा, पंजाब और आसपास के राज्यों से हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यह मेला सामाजिक समरसता और लोक परंपराओं का भी प्रतीक माना जाता है।