सोनीपत जिले की गोहाना तहसील में स्थित कथूरा गांव अपनी ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान के लिए पूरे क्षेत्र में जाना जाता है। करीब 18 हजार की आबादी और लगभग 8 हजार मतदाताओं वाला यह गांव क्षेत्र के प्रभावशाली गांवों में शामिल है। कथूरा गांव पांच प्रमुख पानों में बसा हुआ है। इनमें न्याण-ग्याण, करमसण, कालिया, भैभराण और प्रब्याण पाना शामिल हैं। इनमें न्याण-ग्याण पाना सबसे बड़ा माना जाता है। गांव में विभिन्न समाजों और जातियों के लोग आपसी भाईचारे और सौहार्द के साथ रहते हैं, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। गांव की पहचान नरवाल खाप के प्रमुख केंद्र के रूप में भी है। कथूरा का प्रमुख गोत्र नरवाल है और माना जाता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में बसे अनेक नरवाल परिवारों की जड़ें इसी गांव से जुड़ी हुई हैं। गांव में नरवाल खाप का भवन भी स्थित है, जहां समय-समय पर सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार गांव के पूर्वज राजस्थान के ददरेड़ा क्षेत्र से यहां आकर बसे थे। उन्होंने ही इस गांव की स्थापना की थी। यह इतिहास आज भी गांव के लोगों के लिए गर्व का विषय बना हुआ है। धार्मिक दृष्टि से भी कथूरा का विशेष महत्व है। गांव में प्राचीन शिव मंदिर, बाबा माडूनाथ के दो मंदिर, हनुमान मंदिर, दादा खेड़ा और माता के मंदिर श्रद्धा के प्रमुख केंद्र हैं। इन धार्मिक स्थलों पर पूरे वर्ष पूजा-अर्चना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। खेती गांव की मुख्य आजीविका का साधन है। इसके साथ-साथ गांव के लोग शिक्षा, खेल, सेना और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। गांव के युवा विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल कर कथूरा का नाम रोशन कर रहे हैं। इतिहास, संस्कृति, आस्था और भाईचारे की मिसाल बना कथूरा गांव आज भी अपनी परंपराओं को संजोते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि कथूरा केवल एक गांव नहीं, बल्कि विरासत, सम्मान और सामाजिक एकता की पहचान बन चुका है।