सोनीपत जिले का बरोदा गांव कुश्ती की परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जहां अखाड़ों की मिट्टी से निकलकर पहलवान देश-दुनिया में नाम कमा रहे हैं। समय के साथ माटी से मैट तक का सफर बदला, लेकिन बरोदा की धाक जस की तस है। गांव पहलवानों की नर्सरी बना हुआ है, जहां अनुभवी पहलवान अखाड़ों में पदकों की फसल तैयार कर रहे हैं। गांव में कुश्ती की गौरवशाली परंपरा की नींव पंडित शीशराम पहलवान ने रखी थी। उस समय कुश्ती के साधन सीमित थे, लेकिन उनके जज्बे और अनुशासन ने गांव के युवाओं को एक नई दिशा दी। उनके समय में बरोदा नामचीन पहलवानों का गांव बन गया। कुश्ती में दांव आजमा चुके 70 वर्षीय रणबीर सिंह मोर कहते हैं- पं. शीशराम के कारण बरोदा का नाम दूर-दूर तक पहुंचा। पहलवानों के बीच गांव को ‘शीशराम वाला बरोदा’ कहा जाने लगा। उन्होंने अखाड़ों में ऐसी संस्कृति बनाई, जिसमें मेहनत, सादगी और खेल भावना को सबसे ऊपर रखा गया। उनके बाद जगत सिंह पहलवान ने इस विरासत को और मजबूत किया। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और शानदार दांव-पेच के दम पर ‘हिन्द केसरी’ का खिताब जीता और ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ जैसे बड़े सम्मान हासिल किए। उनकी सफलता ने गांव के युवाओं में नया जोश भर दिया और बड़ी संख्या में बच्चे अखाड़ों की ओर आकर्षित होने लगे। शीशराम और जगत सिंह की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बरोदा के राजेन्द्र सिंह ने गांव का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाया। 74 किलोग्राम भार वर्ग में उन्होंने कॉमनवेल्थ, एशियाड और एशिया चैंपियनशिप में देश के लिए पदक जीते। उन्होंने ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया, जो गांव के लिए गर्व की बात रही। खेल के साथ-साथ उन्होंने हरियाणा पुलिस में डीआईजी के पद तक सेवाएं दीं। रिटायरमेंट के बाद भी वे अखाड़ों में जाकर युवाओं को प्रशिक्षण दे रहे हैं और उन्हें जीत के गुर सिखा रहे हैं। बरोदा ठुठान की सरपंच सीमा देवी ने बताया कि नई पीढ़ी में रमनदीप बरोदा की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कम उम्र में ही उन्होंने बड़ी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। खेलो इंडिया में 2 गोल्ड और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 3 गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपनी काबिलियत साबित की है। इसके अलावा वे इटली और तुर्की जैसे देशों में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनकी सफलता से गांव के अन्य युवाओं को भी प्रेरणा मिल रही है। महिला कुश्ती में भी बरोदा पीछे नहीं है। गांव की बेटी सरिता मोर ने छोटे से गांव से निकलकर अपनी मेहनत और लगन के दम पर दुनिया में पहचान बनाई। शुरुआत में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार आगे बढ़ती रहीं। सरिता मोर ने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। इसके अलावा वे राष्ट्रीय स्तर पर भी कई पदक जीत चुकी हैं और भारतीय टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। बरोदा की बेटी सरिता मोर ने महिला कुश्ती में बड़ा नाम कमाया है। उन्होंने एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। वह युवाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं। राजेन्द्र सिंह ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांव का नाम रोशन किया। 74 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने कॉमनवेल्थ, एशियाड और एशिया चैंपियनशिप में पदक जीतकर तिरंगा लहराया और ओलंपिक में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। नौकरी के दौरान वे हरियाणा पुलिस में डीआईजी पद से सेवानिवृत्त हुए। इन जैसे लोग हमारे गांव की शान हैं। सरिता बचपन से ही खेलों में रुचि रखती थी। पहले इसने कबड्डी खेलना शुरू किया और फिर कुश्ती खेलना शुरू किया। सरिता विश्व की पहली महिला पहलवान हैं जिन्होंने एशिया में 3 गोल्ड जीते। 2022 में बेटी को अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। अब रेलवे में नौकरी करती हैं और राई में स्पोर्ट्स डायरेक्टर के पद पर है। बरोदा में बचपन से ही बच्चों में कुश्ती के प्रति जुनून होता है। इस गौरवशाली परंपरा की शुरुआत पं. शीशराम पहलवान से हुई, जिनके नाम पर एक समय गांव की पहचान बनी रहती थी। उन्होंने मिट्टी के अखाड़ों में अनुशासन और खेल भावना की मजबूत नींव रखी। उनके बाद जगत सिंह पहलवान ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘हिन्द केसरी’ का खिताब जीता और ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ जैसे सम्मान हासिल किए। गांव खिलाड़ियों की खान है।