फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मेरा गांव मेरी शान: महाभारत काल में दुर्योधन को हारकर तालाब में छुपे थे पांडवों, अहर गांव का धार्मिक महत्व से यह बहुत पुराना

इसराना खंड के अहर गांव का इतिहास महाभारत काल का है। मान्यता है कि महाभारत के दौरान गांव के तालाब (अब बोडंग वाला तालाब) में दुर्योधन भीम के साथ मल युद्ध में थक हार गए थे। वे तालाब इसी तालाब में आकर छुपकर बैठ गए थे। तालाब के साथ बरगद के पेड़ के नीचे दोनों के बीच युद्ध हुआ था। पांडवों ने इसी गांव में आहार (खाना खाया था) किया था। इसी से गांव का नाम पहले आहार पड़ा। इसे बाद में बदलकर अहर गांव रख दिया। यहां बड़े तालाब की बुर्जी और शीशे की पोड़ी आज भी हैं। अतिक्रमण के चलते बुर्जी और कांच की पोड़ी अब मिट्टी के नीचे दबा दी गई हैं। हालांकि गांव के बसाने के पीछे राजस्थान के राजा रोड़ के वंशजों द्वारा गांव बसाने की भी बात कही जा रही हैं। अहर गांव जिला मुख्यालय से करीब 31 किलोमीटर दूरी पर पानीपत-सींक रोड पर स्थित है। अमर उजाला की टीम ने मेरा गांव मेरी शान अभियान के अंतर्गत ग्रामीणों के बीच तीन घंटे रहकर गांव के इतिहास और अन्य विषयों के बारे में जाना। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुमेर सिंह खैंची ने बताया कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली का राजपाट छीन लिया था। उन्होंने उस समय के रजवाड़ों से सोने की चिड़िया मांगी थी। राजस्थान के बहरोड़ किला के राजा रोड़ ने डोला (लड़की का रिश्ता) करने से मना कर दिया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने रक्षाबंधन तक राज्य खत्म करने की धमकी दी थी। राजा रोड़ अपने कुछ सैनिकों को साथ लेकर बादली (दिल्ली) के आसपास जंगलों में आकर रहने लगे। उस समय बस्ती 50 से 100 किलोमीटर पर होती थी। इसमें भी झुग्गी-झोपड़ी अधिक होती थी। इनके बाद शासकों ने लोगों से वसूली का खेल शुरू कर दिया। अकबर के शासनकाल के दौरान टोडरमल राजस्व मंत्री होते थे। उन्होंने टैक्स वसूली के लिए सीमांकन पत्थर गाड़े थे। धीरे-धीरे समय बीतने पर राजा रोड़ के वंशज बादली को छोड़कर आसपास के क्षेत्र में आकर छिप गए थे। पूर्वजों का मानना है कि एक बार एक भैंस दौड़कर जा रही थी। वह किसी के रोके से नहीं रुक रही थी। किरपी थरड़क नाम की युवती घर से काम के लिए जा रही थी। भैंस उनके पास से गुजर रही थी और उन्होंने भैंस पर बंधी रस्सी पर पैर रख दिया। भैंस वहीं रुक गई। खैंची गोत्र के एक व्यक्ति ने किरपी से शादी का प्रस्ताव रखा था। किरपी थरड़क के परिवार ने उनके साथ शादी कर दी और खैंची को खेड़ा दान में दे दिया। अहर गांव में फिर खैंची गोत्र के लोग बस गए। वैद्य उमा दत्त शर्मा ने बताया कि अहर और इसके साथ लगता कुराना गांव महाभारत काल में बसे हैं। मान्यता है कि कौरवों के आने कुराना और पांडवों के आने से आहार गांव बसा। आहार गांव का नाम बाद में अहर रखा गया। मेरे पिता कृष्ण दत्ता बताते थे कि मंदिर के साथ बड़े तालाब में महाभारत काल में दुर्योधन आकर जल में छुपकर बैठ गए थे। यहां कांच की पोड़ी और बुर्जी होती थी। दुर्योधन में शक्ति थी कि वे जहां बैठते थे पानी उतना ही पीछे हट जाता था। भीम और दुर्याेधन के बीच बरगद के पेड़ के नीचे युद्ध हुआ था। मेरे परदादा तोताराम ने कांशी में पूजा पाठ की और फिर गांव में आकर यहां तालाब के साथ पेड़ के नीचे तप किया। उन्होंने यहां शिव मंदिर बनवाया। उनके बाद मेरे दादा रामेश्वर दत्त ने कांशी के बाद मंदिर में पूजा पाठ की।

विज्ञापन

Latest

Recommended

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
AU ऐप में पढ़ें