गांव धनौंदा की दक्ष प्रजापति धर्मशाला में चल रही श्रीमद् शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन सती चरित्र कथा सुनाई गई। कथा वाचक आचार्य पूर्णदेव महाराज ने कथा के दौरान वर्तमान समय में पारिवारित संबंधों पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवार एक-दूसरे के सहयोग से चलता है। सभी अपने बच्चों को संस्कारवान बनाएं जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार की बाधा न आए। उन्होंने माता सती की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि उनके पिता दक्ष ने एक यज्ञ किया था जिसमें सभी सगे संबंधियों को बुलाया, लेकिन बेटी सती के पति भगवान शंकर को निमंत्रण नहीं भेजा। जब सती को यह पता चला तो उन्हें बड़ा दुख हुआ और उन्होंने भगवान शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। भगवान शिव ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि बिना बुलाए कहीं जाने से सम्मान में कमी आती है। लेकिन माता सती नहीं मानी और यज्ञ में पहुंच गई। वहां पहुंचने पर सती ने अपने पिता सहित सभी को शंकर भगवान के न बुलाने पर बुरा भला कहा और स्वयं को यज्ञ अग्नि में स्वाहा कर दिया। जब भगवान शिव को ये पता चला तो उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर राजा दक्ष की समस्त नगरी तहस-नहस कर दिया। उन्होंने बताया कि परिवार में सभी को मिल जुल कर रहना चाहिए सबसे बड़े व्यक्ति का या फर्ज बनता है कि वह सबसे छोटे व्यक्ति तक सबका ख्याल रखे। जब भी कोई कार्य करें तो परिवार की सहमति लेकर कार्य करें जिससे सफलता मिलेगी। यह सात दिवसीय श्रीमद शिव महापुराण कथा 12 मई तक चलेगी। दोपहर एक बजे से शाम चार बजे तक कथा का रसपान कराया जाएगा।