उपमंडल के गांव छितरौली की बेटी शर्मिला धनखड़ ने अपने अदम्य साहस, संघर्ष और अथक मेहनत के बल पर वह इतिहास रच दिया, जिस पर पूरे देश को गर्व है। 28 जुलाई 2026 को स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स की महिला शॉटपुट एफ-57 स्पर्धा में 9.81 मीटर का सीजन का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए शर्मिला ने स्वर्ण पदक जीत लिया। इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गईं। उनकी इस उपलब्धि ने कॉमनवेल्थ खेलों में पैरा एथलेटिक्स में भारत के 20 वर्षों के पदक इंतजार को भी समाप्त कर दिया।शर्मिला ने प्रतियोगिता में शुरुआत से ही शानदार प्रदर्शन किया। पहले प्रयास में 9.48 मीटर और फिर तीसरे प्रयास में 9.81 मीटर का विजयी थ्रो कर उन्होंने कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, वेल्स और घाना जैसी मजबूत प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को पीछे छोड़ दिया। स्वर्ण पदक जीतते ही ग्लासगो के मैदान में भारतीय तिरंगा शान से लहराया और राष्ट्रगान गूंज उठा। गरीबी, पोलियो और घरेलू हिंसा से जूझकर बनीं विश्व विजेता 15 अगस्त 1986 को गांव छितरौली में जन्मी शर्मिला धनखड़ का बचपन अभावों में बीता। उनके पिता स्वर्गीय जयलाल किसान थे, जबकि माता संतोष देवी आज भी कम दृष्टि होने की समस्या से जूझ रही हैं। परिवार के पास सीमित कृषि भूमि थी, जिसमें से आर्थिक परिस्थितियों के चलते कुछ जमीन बेचनी पड़ी। बचपन में ही महज दो वर्ष की उम्र में तेज बुखार के बाद पोलियो होने से उनका बायां पैर प्रभावित हो गया। 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ, लेकिन ससुराल में उन्हें वर्षों तक दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। दो बेटियों के जन्म के बाद जब वह 26 वर्ष की थीं, तब उनके पहले पति ने उन्हें घर से निकाल दिया। इसके बाद वह दोनों बेटियों को लेकर अपने मायके लौट आईं। जीवन के इस कठिन दौर में उन्होंने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए आया सहित कई छोटे-मोटे कार्य किए। दूसरी शादी बनी जीवन का टर्निंग प्वाइंट 28 वर्ष की आयु में शर्मिला ने अजीत सिंह से दूसरी शादी की। उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया और पैरा एथलेटिक्स में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने राव तुलाराम स्टेडियम में प्रशिक्षण शुरू किया, जहां पैरा एथलीट टेकचंद ने उन्हें प्रशिक्षण दिया। शुरुआती दिनों में उनका शॉटपुट केवल पांच मीटर तक जाता था, लेकिन लगातार अभ्यास और मेहनत से उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। अजमेर सिंह दांगी ने दिखाई नई राह शर्मिला ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एसडीएम वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, छितरौली से प्राप्त की। पारिवारिक संकट के दौर में उन्होंने विद्यालय के संचालक एवं अपने प्रथम गुरु अजमेर सिंह दांगी से मुलाकात कर जीवन की कठिनाइयों को साझा किया। दांगी ने उन्हें निराशा से बाहर निकलने, पैरा खेलों में करियर बनाने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके मार्गदर्शन पर ही शर्मिला को रेवाड़ी स्टेडियम में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया, जहां से उनके खेल जीवन की नई शुरुआत हुई। ग्लासगो से फोन पर बातचीत में शर्मिला ने कहा कि यदि अजमेर सिंह दांगी उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं देते, तो शायद वह आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं। उन्होंने अपने प्रथम गुरु के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में अनेक कोच और मार्गदर्शकों का सहयोग मिला, लेकिन उन्हें खेल की राह पर आगे बढ़ाने की सबसे बड़ी प्रेरणा अजमेर सिंह दांगी से ही मिली। शर्मिला ने वर्ष 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में पदार्पण किया था।