सेक्टर बीटा एक स्थित श्रीराम जानकी मंदिर पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन चल रहा है। कथा के तीसरे दिन शनिवार को कथा वाचक स्वामी ब्रह्मनंदन महाराज ने जड़ भरत व भक्त ध्रुव के प्रसंग सुनाए। प्रसंगों को सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा वाचक ने बताया ने भागवत कथा मानव जीवन के भीतर चलने वाले सकारात्मक और नकारात्मक विचारों के संघर्ष का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने भीतर के विष को धैर्य और भक्ति के माध्यम से निकाल देता है तभी अमृत रूपी ज्ञान की प्राप्ति होती है। श्रीमद्भागवत कथा सुनना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन को सत्य, प्रेम और सेवा के मार्ग पर ले जाने का माध्यम है। उन्होंने बताया कि अवधपुरी में राजा उत्तानपाद राज किया करते थे। उनकी सुनीति और सुरुचि नाम की दो पत्नियां थीं। भक्त ध्रुव, सुनीति के पुत्र थे। लेकिन राजा का सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र से ज्यादा स्नेह था। राजा, ध्रुव को गोद में लेकर बैठे थे तभी वहां सुरुचि आ गई। अपनी सौतन के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बिठाते हुए कहा, राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है और राज सिंहासन का भी अधिकारी हो सकता है जो मेरे गर्भ से जन्मा हो। तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है। यदि तेरी इच्छा राज सिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर। उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा, तभी सिंहासन प्राप्त कर पाएगा। बालक ध्रुव यह बात चुभ गई। उन्होंने वन में जाकर कठिन तपस्या की और उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और गोद में बिठाते हैं।