2005 में बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए थे। अक्टूबर 2005 के इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की मजबूत सरकार बनी थी। सितंबर 2005 में पटना के एक मंच पर खड़े होकर लाल कृष्ण आडवाणी, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों ने एलान किया था कि जो सबसे ज्यादा मतों से बिहार विधानसभा चुनाव जीतेगा, उसे उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे, यह पहले ही साफ था। तब, जितने वोट बाकी कुछ विधायक हासिल कर सके थे- उससे भी ज्यादा 86119 मतों के अंतर से नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने तत्कालीन पटना पश्चिम विधानसभा सीट जीती थी। दुर्भाग्य! उस कुर्सी पर उनके नाम की घोषणा से पहले दिल्ली से बुरी खबर आई कि उनका वहां निधन हो गया। वह एक बुरा अध्याय था, जिससे नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा का छोटा-सा परिवार अचानक बिखर गया था। तब नितिन राजनीतिक रूप से उतने सक्रिय नहीं थे। घाव भरने के लिए भाजपा ने उनकी पत्नी को उप-चुनाव में उतरने कहा, लेकिन उन्होंने बेटे को पिता की जिम्मेदारी संभालने के लिए आगे किया। इसी कष्ट से बिहार की राजनीति में नितिन नवीन का उदय हुआ।
भाजपा संगठन में मजबूत पकड़ देखती है और नितिन नवीन में उसे संभावना दिखी। हां, समय जरूर लगा। विधायक के रूप में नितिन नवीन पटना पश्चिमी क्षेत्र (अब, बांकीपुर विधानसभा) की पहचान बने। उप चुनाव में जीते और फिर हमेशा बड़े अंतर से जीतते ही रहे। केंद्र में भी जब भाजपा की सरकार बन गई तो नितिन नवीन का राजनीतिक रूप बढ़ा। विजन की स्पष्टता और कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ को समझते हुए भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। 2016 से 2019 तक भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा करना नितिन नवीन के लिए फायदेमंद साबित हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में पहचान बनी तो दूसरे राज्य की तरफ भी भाजपा ने उन्हें भेजा। 2919 में सिक्कम का संगठन प्रभारी के रूप में और फिर जुलाई 2024 से छत्तीसगढ़ में नितिन नवीन ने संगठन के लिए जो काम किया और जैसी सक्रियता दिखाई, उसे स्वीकारने का प्रमाण है यह ताजा फैसला। छत्तीसगढ़ प्रभारी के रूप में वह भाजपा के लिए पुनर्वापसी का मंत्र साबित हुए।