पूर्णिया की धरती पर इन दिनों हवा कुछ खास है, जिसमें मिट्टी की महक के साथ राजनीति की गूंज भी घुली हुई है। खेतों में लहराती फसलें अब सिर्फ अन्न नहीं उगातीं, बल्कि उम्मीदों और बदलाव की कहानियां भी कहती हैं। चाय की दुकानों से लेकर गांव की चौपालों तक हर बातचीत का अंत अब एक ही सवाल पर ठहरता है, 'इस बार किसके हाथ लगेगी सत्ता की चाबी?' जब अमर उजाला का चुनावी रथ ‘सत्ता का संग्राम’ पूर्णिया पहुंचा, तो लगा जैसे लोकतंत्र की लहर पूरे इलाके में दौड़ गई हो, कहीं बहस की आवाज, कहीं उम्मीदों की आहट, और हर चेहरे पर भविष्य की चिंता और उत्साह का मेल नजर आया। स्थानीय निवासी विनोद सिन्हा ने कहा, “पूर्णिया में एनडीए की लहर है। इस बार फिर से बिहार में प्रचंड बहुमत के साथ एनडीए की सरकार बनने जा रही है। इसका कारण सिर्फ विकास है। लोग खुद देख रहे हैं कि विकास हुआ है।” रोजगार के सवाल पर उन्होंने कहा, “अगर सरकारी नौकरी को ही रोजगार मानते हैं तो ये अलग बात है। यहां के लोग प्रतिभाशाली हैं और सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियां भी यहीं से मिली हैं। जिसके पास काबिलियत है, वो नौकरी पा ही लेता है।” मौजूदा हालात पर विनोद सिन्हा ने कहा, “यहां के लोग बहुत आगे हैं। कई बड़ी कंपनियों के शोरूम भी पूर्णिया में हैं, जिससे शहर तेजी से विकसित हो रहा है।” वहीं टुनटुन झा ने अलग राय रखते हुए कहा, “यहां रोजगार की समस्या है। कई लोगों ने दुकानें खोलीं, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें बंद करना पड़ा।” सुमित ने कहा, “हम उन लोगों के साथ हैं जो विकास के साथ हैं। आरजेडी के पास यहां कोई बड़ा उम्मीदवार नहीं है, इसलिए मुकाबला एकतरफा दिख रहा है।” रोजगार के मुद्दे पर उन्होंने कहा, “महागठबंधन लगातार रोजगार देने की बात कर रहा है, लेकिन उनके वादे भरोसेमंद नहीं लगते। उन्होंने जिन बातों का वादा किया है, उनके लिए बजट भी नहीं है। यह सब मुंगेरी लाल के सपने जैसे लगते हैं।” स्थानीय निवासी रंजीत कुमार झा ने कहा, “इस बार यहां बदलाव देखने को मिलेगा। हम लोग बीएसपी (BSP) को लेकर आएंगे। इस बार बिहार में बीएसपी गेम चेंजर की भूमिका में नजर आएगी।”