उत्तरकाशी। सदियों से साधकों और तपस्वियों की साधना स्थली रहे गंगोत्री हिमालय क्षेत्र में कंदराओं और कुटियाओं में साधना करने में भी वन कानून आड़े आ रहे हैं। गंगोत्री नेशनल पार्क क्षेत्र में वन विभाग की ओर से कई साधना स्थली उजाड़े जाने पर अब साधु संत परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत अपने साधना स्थलों को नियमित कर कानूनी अधिकार की मांग कर रहे हैं।
गंगोत्री हिमालय क्षेत्र सदियों से साधु संतों की तपस्थली रही है। गंगोत्री और आसपास के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि भोजवासा, तपोवन जैसे बर्फीले इलाकों में भी कई संतों ने वर्षों तक रहकर तपस्या की है। वर्ष 1989 में गंगोत्री नेशनल पार्क के गठन के साथ ही इसमें गंगोत्री हिमालय का 2390 वर्ग किमी हिस्सा शामिल कर यहां कठोर वन कानून लागू कर दिए गए। इस दौरान किसी ने क्षेत्र में साधनारत साधु संतों के हितों के बारे में नहीं सोचा। बीते कुछ सालों में पार्क प्रशासन ने वन कानूनों की आड़ में यहां साधु संतों की कई कुटिया आदि साधना स्थल ध्वस्त कर डाले।
इससे खिन्न साधु संत बीते तीन साल से गंगोत्री हिमालय क्षेत्र में अपने साधना स्थलों को नियमित करने की मांग को लेकर वन विभाग एवं शासन-प्रशासन के अधिकारियों के चक्कर काटने को विवश हैं।
परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत दें अधिकार
गंगोत्री-गोमुख पैदल मार्ग पर कनखू बैरियर के निकट साधनारत साध्वी पक्षी प्रकाशमयी ने बताया कि बीते तीन अप्रैल को शासनस्तर पर हुई बैठक में वन अधिकार अधिनियम के तहत साधु समाज के अधिकार संरक्षित करने पर सहमति बनी थी। इस क्रम में बाकायदा गंगोत्री तीर्थ तपोभूमि ग्राम सभा का गठन कर जांगला से तपोवन के बीच कुल 40 साधु संतों की कुटिया, आश्रम एवं गुफाओं जिनका रकबा महज 2.75 हेक्टेयर है को नियमित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस प्रस्ताव को एसडीएम की अध्यक्षता वाली उपमंडल समिति की संस्तुति के बाद जिला स्तरीय समिति को भेजा गया है।
कोट...
परंपरागत वन निवासी अधिकार अधिनियम के तहत गंगोत्री हिमालय क्षेत्र में 40 साधु-संतों को उनकी कुटिया एवं गुफाओं में साधना, वहां तक आवाजाही तथा मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का अधिकार मुहैया कराने का प्रस्ताव जिला स्तरीय समिति को भेजा गया है। अब इस पर जिला समिति को निर्णय लेना है।
देवेंद्र नेगी, एसडीएम, भटवाड़ी