मंगलौर में मातमी जुलूस निकालते शिया समुदाय के लोग।
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रबीउल अव्वल की आठ तारीख को शिया समुदाय की ओर से अंतिम मातमी जुलूस पूरी अकीदत के साथ निकालकर इमाम हुसैन को याद किया गया। मजलिस में कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन करते हुए लोगों ने हिस्सा लिया और हजरत इमाम हुसैन व उनके साथियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इसी के साथ पिछले सवा दो महीने से जारी मोहर्रम के मातमी कार्यक्रम संपन्न हो गए।
कर्बला में शहीद हुए हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में शिया समुदाय के लोग रबीउल अव्वल की आठ तारीख तक शोक मनाते हैं। इस दौरान वह खुशी के कार्यक्रम में शामिल नहीं होते हैं और न ही किसी प्रकार के विवाह आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। शुक्रवार को मोहल्ला पठानपुरा स्थित जैनबिया इमामबाड़े से शुरू हुआ अंतिम मातमी जुलूस चुंगी नंबर तीन होते हुए दरबार-ए-हुसैन में समाप्त हुआ। जुलूस से पहले मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस की शुरुआत सोजो सलाम, मरसिया के साथ रिहान हैदर, शमशुल हसन, मुशीर हुसैन और इमाम अली तला अली हसन ने की। मौलाना इकबाल हुसैन जाफरी ने बताया कि हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर उनको खिराज-ए-अकीदत पेश की गई। कर्बला में कोई भी जुल्म ऐसा नहीं बचा था, जो हजरत इमाम हुसैन, उनके खानदान और साथियों पर न हुआ हो।
इमाम हुसैन के भूखे-प्यासे छोटे-छोटे बच्चों को भी शहीद कर दिया गया। साथ ही नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन को भी बुरी तरह से शहीद किया गया था। उन्हीं की याद में हर वर्ष मोहर्रम का चांद नजर आने के बाद माह-ए-रबीउल अव्वल की आठ तारीख तक शोक मनाया जाता है। उन्होंने सभी लोगों से हुसैन के बताए मार्ग पर चलने की अपील की। साथ ही अनुयायियों ने मातमी जुलूस निकालकर हुसैन को याद किया। मजलिस और मातम के दौरान कोरोना की गाइडलाइन का ध्यान रखा गया। इस अवसर पर अकील अहमद, अमीर हैदर जैदी, रजब अली आरफी, अली हैदर जैदी, फहीम अब्बास जैदी, मोहम्मद तकी, मोहर्रम अली, नसीम हैदर जाफरी, मोहम्मद अली जाफरी, वफा आबदी मौजूद रहे।