डीडीहाट (पिथौरागढ़)। शिक्षा का अधिकार और सभी को रोजगार का दावा आदिम जनजाति वनरावतों के मामले में बेमानी साबित हो रहा है। रोजगार के अभाव में परिवार की मुफलिसी के चलते वनराजि परिवार के अधिकतर बच्चे रोजी-रोटी के लिए 14-15 की उम्र में ही स्कूल छोड़ रहे हैं।
डीडीहाट तहसील के वनराजि गांव मदनपुरी, कूटा चौरानी में उत्तराखंड की एकमात्र आदम जनजाति वन रावतों के लगभग 70 परिवाररहते हैं। पढ़े-लिखे न होने से इन परिवारों के मुखिया के पास रोजगार का कोई साधन नहीं है। सभी परिवार मजदूरी कर पेट पालते हैं।
वनराजियों के बच्चे प्राइमरी तक तो स्कूल जाते हैं लेकिन छठी और सातवीं कक्षाओं को पास करने के बाद 14 से 15 साल की उम्र के बच्चे पढ़ाई छोड़कर माता-पिता के साथ मजदूरी करने चले जाते हैं। कोरोना के बाद स्कूल छोड़ने वाले वनराजि बच्चों की संख्या में इजाफा हो गया है।
कक्षा सात तक की पढ़ाई के बाद स्कूल छोड़ने वाले वनराजि नरेंद्र सिंह रजवार, हिमांशु सिंह रजवार, होशियार सिंह रजवार बताते हैं कि स्कूल जाने से उनका और उनके परिवार का पेट नहीं भरेगा। जब वह मजदूरी करके पैसा कमाएंगे तब उनके घर में राशन आएगा।
वनराजि गोविंद सिंह बताते हैं कि उनके बेटे नरेंद्र ने कक्षा सात तक पढ़ाई की। आगे पढ़ाई कराने के लिए उनके पास पैसा भी नहीं है। इस महंगाई के दौर में अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देने के लिए गोविंद ने अपने बेटे से भी मजदूरी करवाना शुरू कर दिया है।
कोरोना के बाद और लगातार बढ़ती महंगाई के बाद से वनराजि परिवार के अधिकतर बच्चे अपने घरों में ही रह गए हैं। प्राइमरी में पढ़ने वाले वनराजि बच्चे तो स्कूल जा रहे हैं लेकिन कक्षा सात और आठ में पढ़ने वाले बच्चों ने स्कूल जाना बंद करके अपने पिता, माता के साथ मजदूरी करना शुरू कर दिया है।
बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? इसकी जांच की जाएगी। मनरेगा योजना से वनराजि लोगों को रोजगार मिला है या नहीं इसकी भी जांच करवाई जाएगी।
- भगत सिंह फोनिया, एसडीएम, डीडीहाट।