आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के संभावित दावेदारों की नींद उड़ी है। इसकी वजह पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनकी बेटी अनुपमा रावत हैं। अनुपमा की हरिद्वार ग्रामीण में सक्रियता बढ़ी है। जबकि हरीश रावत ने हरिद्वार को अपनी कर्मस्थली और खुद को हरिद्वारी लाल कहकर सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। हरीश रावत के बयानों से कांग्रेसी दावेदारों को जहां खुद के टिकट कटने का डर सता रहा है तो भाजपा को हरदा से सीधी टक्कर मिल सकती है। फिलहाल कांग्रेस के दावेदार वेट एंड वॉच की स्थिति में आ गए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का हरिद्वार से राजनीतिक जुड़ाव रहा है। हरिद्वार से सांसद निर्वाचित होकर केंद्रीय मंत्रीमंडल तक पहुंचे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से हरीश रावत को हार का मुंह देखना पड़ा था। इसके बाद भी उन्होंने हरिद्वार जिले में अपनी सक्रियता नहीं छोड़ी। सोशल मीडिया के सार्वजनिक मंच से हरिद्वार के ज्वलंत मुद्दों को उठाते रहे हैं।
हरिद्वार जिले में 11 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें कांग्रेस के तीन विधायक हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए अधिकतर सीटों पर कांग्रेस के दावेदारों में होड़ मची है। जिले की नौ सीटों पर भाजपा के विधायक हैं। आगामी चुनाव में मौजूदा विधायकों को टिकट रिपीट होने की संभावना है। सेकेंड लाइन के भाजपाई सार्वजनिक तौर पर दावेदारी नहीं कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस में हरीश रावत और अनुपमा ने दावेदारों की नींद उड़ाई है। हरिद्वार ग्रामीण में मुसलिम वोटरों की संख्या अच्छी है। अनुपमा रावत ग्रामीण क्षेत्र में पुराने कांग्रेसी नेताओं और मुसलिम समाज में मजबूत पकड़ रखने वालों से मेलजोल बढ़ा रही हैं। अनुपमा की सक्रियता कांग्रेसी दावेदारों को हजम नहीं हो रही है।
हरीश रावत कहां से चुनाव लड़ेंगे, इसको लेकर उन्होंने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन उनके बयान से कांग्रेसी दावेदार ही नहीं भाजपा के लोग भी बेचैन हैं। हालांकि हरीश रावत 2017 में वर्तमान विधायक स्वामी यतीश्वरानंद से चुनाव हारे हैं। लेकिन इन पांच सालों में हरिद्वार ग्रामीण में राजनीतिक समीकरण काफी बदले हैं। आम आदमी पार्टी की दस्तक से हरिद्वार ग्रामीण में चुनाव रोचक होगा।