अस्पताल में रहना शायद ही किसी को अच्छा लगता है। लेकिन निराश्रित वार्ड में भर्ती होने वाले बुजुर्ग और मानसिक व शारीरिक रूप से दिव्यांग ठीक होने के बाद भी अस्पताल नहीं छोड़ना चाहते हैं। अस्पताल में इलाज के साथ समय पर खाना और अपनों जैसा स्नेह-प्यार मिलता है। वार्ड में महीनों तक भर्ती रहने वालों से स्वीपर से लेकर डॉक्टर तक का अटूट रिश्ता बन जाता है। अस्पताल से ठीक होकर जाने वालों को स्टाफ की ओर से यादगार विदाई दी जाती है।
हरिद्वार जिला अस्पताल में प्रदेश का एकमात्र निराश्रित वार्ड है। वार्ड में 12 बेड (छह पुरुष और छह महिला) क्षमता है। हमेशा बेड क्षमता से अधिक लोग यहां भर्ती रहते हैं। इसकी वजह हरिद्वार धार्मिक स्थल होना है। जिन बुजुर्गों का ठौर-ठिकाना नहीं होता है वह घूमते हुए हरिद्वार आ जाते हैं और यहीं के होकर रह जाते हैं। इसी तरह मानसिक एवं शारीरिक दिव्यांग भी हरिद्वार में भीख मांगकर पेट भरते हैं। निराश्रित दिनभर भीख मांगने के बाद फुटपाथ पर ही खुले आसमान के नीचे सो जाते हैं। बुढ़ापे में उम्र बढ़ने और मौसमी बदलाव से कई बीमार भी पड़ जाते हैं। कइयों को रात में वाहन टक्कर मारकर जख्मी कर देते हैं। पुलिस और 108 एबुलेंस की मदद से बीमार और लाचार लोगों को जिला अस्पताल के निराश्रित वार्ड में भर्ती कराया जाता है। भर्ती होने वालों में अधिकतर बुजुर्ग और शारीरिक एवं मानसिक लाचार होते हैं। उनको खुद ही सुध नहीं होती है। वार्ड में कई महीनों तक उनकी देखभाल होती है। अस्पताल में समय पर खाना, दवा दी जाती है। अस्पताल स्टाफ ही उनकी देखरेख करता है।
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स्टाफ कर्मी जुटाने हैं हर महीने रुपये
वार्ड में वर्तमान में 17 लोग भर्ती हैं। इनमें दो को छोड़कर बाकी उम्रदराज और बेसुध हैं। कइयों को खुद का नाम तक पता नहीं है। अस्पताल के कर्मचारी ही उनके कपड़े बदलते हैं। नहलाते हैं। दाड़ी बनवाने से लेकर बाल कटवाते हैं। निराश्रितों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वार्ड ब्वाय, नर्स, स्वीपर और डॉक्टर हर महीने अपनी जेब से रुपये एकत्र करते हैं। औसतन महीने में पांच हजार रुपये तक एकत्र होते हैं। नर्सिंग स्टाफ सहायक सीता शर्मा बताती हैं, महीनों तक वार्ड में रहने वाले मरीजों से भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। अस्पताल से छुट्टी होने पर स्टाफ कर्मचारी सामूहिक विदाई देते हैं।
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निराश्रित वार्ड में हर महीने औसतन 15 से 20 मरीज आते हैं। कई मरीज दो महीने तक भर्ती रहते हैं। अधिकतर बुजुर्ग और भीख मांगने वाले होते हैं। कई मानसिक रूप से कमजोर या फिर शारीरिक रूप से दिव्यांग होते हैं। वार्ड में भर्ती करने के बाद इलाज करने के साथ उनकी देखभाल की जाती है।
- डॉ. राजेश गुप्ता, सीएमएस हरिद्वार