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रामनगर की रामलीला: श्रीराम का बाण लगते ही रावण का हुआ अंत, काशी नरेश का भी लगा दरबार

Tue, 08 Oct 2019 01:30 AM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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शाही सवारी पर सवार काशी नरेश। - फोटो : अमर उजाला
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥ धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई।। रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गई। समुद्र, नदियां, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़ के दोनों टुकड़ों को फैलाकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। आखिरकार सत्य की जीत हुई।
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- फोटो : r
रामनगर की रामलीला में सोमवार को भगवान श्रीराम का बाण लगते ही रावण की नाभि काअमृत कुंड सूख गया। दूसरे तीस बाण उसके सिर और भुजाओं में लगे। दसों सिर और बीसों भुजाओं से रहित धड़ पृथ्वी पर नाचने लगा। धड़ प्रचंड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धंसने लगी। तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए। प्रभु श्रीराम के हाथों रावण का अंत हुआ और देवताओं को उनके अभीष्ट की प्राप्ति हुई।
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रात में लंका में रावण का अंतिम संस्कार परिवार में एकमात्र जीवित सदस्य विभीषण ने किया। वहीं, लंका मैदान के आसपास विजय दशमी का मेला चरम पर रहा। रामनगर व आसपास के दर्जनों गांव से हजारों लोग लंका मैदान में पहुंचे और शाम 5 बजे से लेकर रात 10 बजे तक मेले का आनंद लेते रहे। उधर, रामलीला में मौजूद लीला प्रेमी श्रीराम का जयजयकार करते हैं, जिससे पूरा वातावरण राममय हो जाता है। भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया गया।

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रामनगर दुर्ग में विजय दशमी का पर्व राजसी शान और परंपरागत तरीके से मनाया गया। काशी राज परिवार के अनंत नारायण सिंह ने चारों वेदों के विद्वान ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच विधि विधान से शस्त्र पूजन किया। इसके बाद 36वीं वाहिनी पीएसी के जवानों ने सलामी दी। तत्पश्चात शाही दरबार लगा। राज परिवार से जुड़ी महिलाओं ने उनकी नजर उतारी।
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दुर्ग में स्थित मंदिरों में दर्शन के बाद शाम लगभग 5:15 बजे सुसज्जित हाथियों पर राजसी पोशाक में अनंत नारायण सिंह की सवारी निकली। सवारी के दुर्ग के बाहर आते ही उपस्थित जन समुदाय ने हर-हर महादेव का उद्घोष कर उनका अभिनंदन किया। शाही सवारी बटाऊ वीर पहुंचने पर अनंत नारायण सिंह ने परंपराओं के अनुसार शमी वृक्ष का पूजन व परिक्रमा की।
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इसके बाद सवारी रामलीला स्थल लंका पहुंची, जहां सभी ने रामलीला का आनंद लिया। शाम को किले में दरबार सजाया गया और मुसाहिबों ने उनको नजर पेश की। नजर के रूप में मुसाहिबों ने रुमाल में एक रुपये का सिक्का रखकर अनंत नारायण सिंह को पेश किया तो उन्होंने उनको पान का एक बीड़ा दिया। नजर पेश करने की परंपरा संपन्न होने के साथ ही विजय पर्व का समापन हो गया।
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