अपनी लेखनी से समाज के सामने चुनौतियां छोड़कर चले गए। लमही में ही उन्होंने 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियों की रचना की। हर वर्ग की सच्चाई काले अक्षरों में दुनिया के सामने पेश की। इसके अलावा तीन नाटक, 10 पुस्तकों का अनुवाद, सात बाल साहित्य और न जाने कितने लेख इस बात की गवाही देते हैं कि उस समय अंधविश्वास कितना चरम पर था।
उनके साहित्य में गरीबी को बिल्कुल ठंडे दिमाग से झेलने की क्षमता भी है। सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को झेलते हुए उन्होंने दैनिक जीवन की तमाम दुश्वारियों को अपनी लेखनी से कहानियों में ढाल दिया।
वरिष्ठ साहित्यकार व भोजपुरी अध्ययन केंद्र बीएचयू के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद दुख के अहसास के रचनाकार हैं जो उन्हें गहरी सामाजिकता से जोड़ता है। उनका दुख निम्न वर्गीय दुख है जहां वे हर शोषित व उपेक्षित से साथ खड़े होते हैं। उनके यहां शोषण के बहुआयामी तंत्र के ताकत का दुख है जो प्रसरणशील है।
वह शनिवार को पुलिया प्रसंग संस्था द्वारा प्रेमचंद की 142वीं जयंती की पूर्व संध्या पर आईआईटी बीएचयू चौराहे पर प्रेमचंद का दुख विषय पर आयोजित परिचर्चा की अध्यक्षता कर रहे थे। बीएचयू के भौतिक विभाग में आचार्य प्रो. देवेंद्र मिश्र ने कहा कि साहित्यानुरागी व्यक्ति निडर होता है, इसके ज्वलंत उदाहरण हैं प्रेमचंद।
युवा आलोचक डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि प्रेमचंद का सारा साहित्य भूख के लहराते सागर से सना हुआ दिखाई पड़ता है। काशी के अस्सी की प्रतिनिधि आवाज कवि डॉ. शैलेंद्र सिंह ने कहा कि प्रेमचंद की प्रखर और सजग पत्रकारिता भी उनके दुख को व्यंजित करती है। इस अवसर पर शोधार्थी उमेश गोस्वामी, अक्षत पांडेय, अमित कुमार, नीलेश देशमुख, शुभम चतुर्वेदी व निखिल द्विवेदी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। शोध छात्र उदय पाल ने संचालन किया तो मनकामना शुक्ल पथिक ने आभार व्यक्त किया।