पूर्वजों ने बताया था कि औरंगजेब के फरमान के बाद 1669 ई में मुगल सेना ने विश्वेश्वर मंदिर ध्वस्त कर दिया था। स्वयंभू ज्योर्तिलिंग को कोई क्षति न हो इसके लिए महंत पन्ना महाराज शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में कूद गए थे। सेना ने नंदी की प्रतिमा को तोड़ने का प्रयास किया लेकिन तोड़ नहीं पाए।
बाबा विश्वेश्वरनाथ जहां हुआ करते थे उसको ज्ञानवापी कूप कहा जाता था जो वर्तमान में ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है। डॉ. तिवारी ने कहा कि उनके पूर्वजों को अहिल्याबाई ने बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर की पूजा-पाठ व सेवा का अधिकार दिया था। ऐसे में हम मांग करते हैं कि ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग की पूजा, स्नान, आरती, भोग व सफाई का अधिकार दिया जाना चाहिए।